तीजन बाई : जिसने पंडवानी को गांव की चौपाल से दुनिया के मंच तक पहुंचाया

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लेख । teejan bai : भारत में अब तक शिर्फ़ ऐसे 17 से 20 नागरिक हैं जिन्हें देश के तीनों शीर्ष पद्म पुरस्कार से नवाज़ा गया है, और आपको ज्ञात हों की छत्तीसगढ़ के पंडवानी की जान डॉ. तीजन बाई उन्हीं शीर्ष कलाकारों में एक थी। और आपको ये जानकर भी अत्यंत गर्व महसूस होगा की भिलाई के समीप छोटे से गनियारी गांव की रहने वाली डॉ. तीजन बाई छत्तीसगढ़ की एकलौती ऐसी नागरिक हैं जिन्हे देश के तीनों पद्म पुरस्कार मिलें हैं।

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पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक बहुचर्चित लोक गाथा

teejan bai : पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक बहुचर्चित लोक गाथा है, जो आज विश्व भर में प्रसिद्ध है, और आप यह अवश्य मानेंगे के जब भी आप कभी पंडवानी सुनेंगे या पंडवानी की बात करेंगे तो आपके जुबान में एक नाम अवश्य आ ठहरेगा, जो है डॉ. तीजन बाई का। छत्तीसगढ़ राज्य के पंडवानी लोक गीत-नाट्य की पहली महिला कलाकार तीजन बाई ने पंडवानी को पुरे विश्व तक पहुँचाया है, जिसमें उन्होंने कपालिक शैली की पांडवनी में गाया ।

कहाँ हुआ तीजन बाई का जन्म;कैसे उन्हें पंडवानी से लगाव

आइये जानते हैं, हम सब के लिए प्रेरणा स्वरुप तीजन बाई के बारे में विस्तार से। कहाँ हुआ तीजन बाई का जन्म कैसे उन्हें पंडवानी से लगाव हुआ 

teejan bai : तीजन बाई का जन्म भिलाई से 14 किलोमीटर (8.7 मील) उत्तर में गनियारी गांव में चुनुक लाल पारधी और उनकी पत्नी सुखवती के घर 8 अगस्त 1956 को हुआ था। वह छत्तीसगढ़ राज्य की पारधी अनुसूचित जनजाति से थीं और डॉ तीजन बाई अपने 5 भाई बहनों में सबसे बड़ी भी थीं।

teejan bai : बताया जाता है की अपने बचपन में, उन्होंने अपने नाना बृजलाल परधी को छत्तीसगढ़ी लेखक सबल सिंह चौहान द्वारा छत्तीसगढ़ी में लिखित महाभारत का पाठ करते हुए सुना और तुरंत ही उन्हें यह पसंद आ गया। धीरे-धीरे उन्हें ये कहानियां याद हो गई। उनकी लगन और प्रतिभा को देखकर गायक उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें प्रशिक्षण दिया।

teejan bai : तीजन बाई बताई थीं कि,जब वो पहली बार अपने नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी सुनी, उनकी आवाज सुनकर शरीर हिल गया, पता नहीं क्या हुआ था, मैं नाना से डरती थी। इसलिए उनकी आवाज सुनने के लिए मैं झोपड़ी के बाहर बैठ उसे सुनती। वो कहा था की, मुझसे कहा जाता कि, ये पंडवानी तुम्हारे बस की बात नहीं है। इसके बावजूद वे पंडवानी सुनने जाती।

नाना ने कहा मेरे घर में नवरत्न है 

teejan bai : एक दिन उनके नाना ने देख लिया, नाना ने कहा, चलो बताओ अब तक तुमने क्या-क्या सुना। तो उन्होंने 15 दिन का दोहा 5 मिनट में कह दिया। नाना ने कहा, मेरे घर में नवरत्न है और मुझे पता ही नहीं। तब उनकी मां ने और बाकि लोगों ने उनका विरोध किया तो तीजन बाई गनियारी स्थित अपना घर छोड़ चंदखुरी चली गई। फिर वहां से उनका सफर शुरू हुआ।

teejan bai : पहले होता यूँ था की बच्चे बड़े नहीं होते थे उनका व्याह करा दिया जाता था, तो वैसे ही 12 वर्ष की आयु में तीजन बाई का विवाह कर दिया गया, हालाँकि वे 13 वर्ष की आयु में भाग निकलीं। क्योंकि उस समय लड़कियों के इस तरह से लोक गायन आदि पर बहुत रोक टोक थें, और उनके ससुराल वालों को भी यह पसंद नहीं था जिसके चलते उन्हें परिवार और समाज से विरोध और अलगाव जैसी स्तिथि झेलनी पडी।

तीजन बाई द्वारा प्रथम मंचीय प्रस्तुती और आगे का जीवन

teejan bai : तीजन बाई ने 13 वर्ष की आयु में, पड़ोसी गाँव चंद्रखुरी में 10 रुपये में अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन दिया ,जिसमें उन्होंने कपालिक शैली की पांडवनी में गाया। यह किसी महिला के लिए पहली बार था, क्योंकि परंपरागत रूप से महिलाएं वेदमती शैली में गाती थीं, जो बैठने की शैली है।

teejan bai : लेकिन तीजन बाई ने परंपरा के विपरीत, तीजन बाई ने खड़े होकर गाने को चुना, अपनी विशिष्ट कर्कश आवाज और अचूक जोश के साथ ज़ोर से गाते हुए, उस क्षेत्र में प्रवेश किया जो तब तक पुरुषों का गढ़ हुआ करता था। थोड़े ही समय में, वह पड़ोसी गाँवों में प्रसिद्ध हो गईं और विशेष अवसरों और त्योहारों पर प्रदर्शन करने के लिए निमंत्रण आने लगे।

देश-विदेश में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया

teejan bai : तीजन बाई को तब एक बार भोपाल के भारत भवन से पंडवानी गाने का न्यौता मिला। यहां उनकी मुलाक़ात हबीब तनवीर से हुई उस दिन ऐसा हुआ की जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और तबसे तीजनबाई का जीवन बदल गया।

teejan bai : उस दिन पंडवानी गायन के दौरान हबीब तनवीर तीजन बाई के अभिनय, गायन और गर्जन को देखकर काफ़ी प्रभावित हुए और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उन्हें पंडवानी गाने का मौक़ा दिलवाया। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से लेकर अनेक अतिविशिष्ट लोगों के सामने देश-विदेश में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

इसके बाद उन्हें कभी पलट कर नहीं देखना पड़ा,उन्होंने इस दौरान फ़्रांस, इटली, जर्मनी, ब्रिटैन, जैसे तमाम देशों में अपनी प्रस्तुति दी। इस दौरान जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपने धारावाहिक भारत एक खोज में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया. इस तरह तीजन बाई की कला घर-घर तक पहुंची।

तीजन बाई सम्मोहित करने वाले अद्भुत नृत्य नाट्य का प्रदर्शन करती थीं

teejan bai : प्रदेश और देश की सरकारी व गैरसरकारी अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत तीजन बाई मंच पर सम्मोहित कर देने वाले अद्भुत नृत्य नाट्य का प्रदर्शन करती थीं । ज्यों ही प्रदर्शन आरंभ होता, उनका रंगीन फुँदनों वाला तानपूरा अभिव्यक्ति के अलग अलग रूप ले लेता ।

तानपूरा कभी दुःशासन की बाँह बनता, तो कभी अर्जुन का रथ

teejan bai : यह तानपूरा कभी दुःशासन की बाँह बनता, तो कभी अर्जुन का रथ, कभी भीम की गदा तो कभी द्रौपदी के बाल में बदलकर यह तानपूरा श्रोताओं को इतिहास के उस समय में पहुँचा देता है जहाँ वे तीजन के साथ-साथ जोश, होश, क्रोध, दर्द, उत्साह, उमंग और छल-कपट की ऐतिहासिक संवेदना को महसूस करते हैं। उनकी ठोस लोकनाट्य वाली आवाज़ और अभिनय, नृत्य और संवाद उनकी कला के विशेष अंग रहा।

तीजन बाई की शैक्षणिक योग्यता, उन्हें 4 बार , मिला डी.लिट् अवार्ड

teejan bai : तीजन बाई औपचारिक शिक्षा बहुत कम प्राप्त कर सकीं। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण वे विद्यालय में अधिक पढ़ाई नहीं कर पाईं और सामान्यतः उन्हेंअल्पशिक्षित या लगभग निरक्षर माना जाता है। उन्होंने अपनी वास्तविक शिक्षा अपने नाना से महाभारत और पंडवानी की परंपरा सीखकर प्राप्त की।

teejan bai : किन्तु पंडवानी गायन और उनके जज़्बे और ज्ञान को देखते हुए उन्हें विभिन्न यूनिवर्सिटीज ने डिलीट की उपाधि से भी सम्मानित किया, तीजन बाई को कुल 4 बार मानद डी.लिट्. (Doctor of Literature) उपाधि प्रदान किए जाने की जानकारी मिलती है, जिनमें से चौथी उपाधि Indira Kala Sangeet Vishwavidyalaya, खैरागढ़ द्वारा प्रदान किए जाने की घोषणा की गई थी।

teejan bai : इस उपलब्धि के साथ वे उस समय छत्तीसगढ़ की पहली लोक कलाकार बनीं जिन्हें इतनी बार मानद डी.लिट्. सम्मान प्राप्त हुआ। और यही कारण है कि लोग अक्सर प्रेरणा के रूप में कहते हैं कि पाँचवीं फेल कलाकार को चार-चार डी.लिट्. की उपाधियाँ मिलीं। डी.लिट्. किसी विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाली सर्वोच्च मानद शैक्षणिक उपाधियों में से एक
है।

खैरागढ़ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट् की उपाधि दी

teejan bai : यह उपाधि उन व्यक्तियों को दी जाती है जिन्होंने साहित्य, कला, संस्कृति या समाज के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया हो। पंडवानी को विश्व मंच तक पहुँचाने के कारण तीजन बाई इस सम्मान की पात्र बनीं। जानकारी के अनुसार, 2014 में भी खैरागढ़ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट्. देने का निर्णय लिया था, लेकिन वे दीक्षांत समारोह में उपस्थित नहीं हो सकीं क्योंकि उस समय वे पुणे में कार्यक्रम के लिए गई हुई थीं। बाद में विश्वविद्यालय ने पुनः उन्हें यह सम्मान देने की प्रक्रिया शुरू की थी।

उन्हें कौन-कौन से पुरस्कार मिले?

भारत में बहुत कम कलाकार ऐसे हैं जिन्हें तीनों पद्म सम्मान प्राप्त हुए हैं, और तीजन बाई उनमें
से एक थीं।
1. पद्म श्री – 1988
2. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार – 1995
3. पद्म भूषण – 2003
4. एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी शताब्दी सम्मान – 2016
5. फुकुओका पुरस्कार (जापान) – 2018
6. पद्म विभूषण – 2019
7. संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप – 2023 के आसपास प्रदान की गई, जो अकादमी
का सर्वोच्च सम्मान है

इन सभी और ऐसे ही अन्य छोटे बड़े सम्मानों से सम्मानित तीजन बाई का स्वाभाव अत्यंत ही
सरल रहा है।

तीजन बाई का स्वर्गवास

teejan bai :  छत्तीसगढ़ की लोक कला पंडवानी को देश और दुनिया में पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन 5 जुलाई 2026 शनिवार देर रात हुआ. वह पिछले कुछ समय से बीमार थीं और अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. तीजन बाई वह 70 वर्ष की थीं, एम्स रायपुर के अनुसार, तीजन बाई ने रविवार सुबह करीब 3.15 बजे अंतिम सांस ली. ततपश्चात उन्हें राजकीय सम्मान के संग अंतिम विदाई दी गई।

teejan bai :  यह पुरे देश और कला प्रेमियों के लिए शोक का पल था। तीजन बाई का जीवन लोगों के लिए एक प्रेरणा का विषय रहा, अनेक चुनौतियों से लड़ते हुए उन्होंने अपना एक अलग पहचान बनाया और राज्य को विश्व स्तर पर प्रस्तुत कीं। तीजन बाई की यादें जन जन के मन में हमेशा साथ रहेगी और लोग उनके बेबाक अंदाज़ को कभी नहीं भूलेंगे और हमेशा उनसे प्रेरित होते रहेंगे।


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