नई दिल्ली, 8 मई 2026 । maharana pratap : भारत के इतिहास में वीरता और राष्ट्रभक्ति की गाथा गाता है एक ऐसा नाम, जिन्हें कहा गया ‘मेवाड़ का शेर’। कई मध्ययुगीन इतिहासकारों ने उन्हें ‘कीका’ नाम से संबोधित किया। उन्हें यह नाम भीलों से मिला था और इस नाम का मतलब था ‘बेटा’।
प्रजा के लिए प्रेम, दया भाव था
maharana pratap : प्रजा के लिए प्रेम, दया भाव था और यही वजह है कि वे एक योद्धा ही नहीं थे, बल्कि एक आदर्श राजा भी थे। बात हो रही है भारत के वीर सपूत और मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप सिंह की। 9 मई 1540 को महाराणा प्रताप सिंह का जन्म राजपूत वंश में राणा उदय सिंह द्वितीय के यहां हुआ।
बचपन से वीरता और शौर्य
maharana pratap : बचपन से ही उनमें वीरता और शौर्य के गुण कूट-कूट कर भरे थे। घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध कौशल में उन्हें महारत हासिल थी। मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर मुगलों के आक्रमण के बाद राणा उदय सिंह को गुरिल्ला युद्ध अपनाना पड़ा।
संघर्षपूर्ण माहौल में महाराणा प्रताप पले-बढ़े
maharana pratap : इस संघर्षपूर्ण माहौल में महाराणा प्रताप पले-बढ़े। उन्होंने अपने पिता से स्वतंत्रता की ज्वाला को विरासत में लिया। जब अकबर ने मेवाड़ को अधीन करने के लिए बल प्रयोग किया, तब महाराणा प्रताप ने मुगल अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
जंगलों में रहकर गुरिल्ला युद्ध आरंभ किया
maharana pratap : उन्होंने जंगलों में रहकर गुरिल्ला युद्ध आरंभ किया। राणा प्रताप के बारे में मशहूर था कि वे जहां भी जाते थे, जाने से पहले मेवाड़ की मिट्टी उठाकर माथे से लगाते थे। सिर्फ यही नहीं, वे एक चुटकी मिट्टी को बांधकर अपने साफे के एक कोने में रखा करते थे।
राणा प्रताप को सिंहासन पर बैठवाया
maharana pratap : उनके इतिहास में बताया जाता है कि 1572 में राणा उदय सिंह द्वितीय का देहांत हुआ तो सबसे बड़े बेटे राणा प्रताप के होने के बावजूद उन्होंने अपने 9वें नंबर के बेटे जगमाल को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। यह अलग बात है कि राज्य के मंत्रियों और दरबारियों ने अंततः राणा प्रताप को सिंहासन पर बैठवाया।
मुगलों को निरंतर चुनौती देते रहे
maharana pratap : मुगल सम्राट अकबर ने मेवाड़ को जीतने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया। चित्तौड़ का दुर्ग खोने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाकर उन्होंने मुगलों को निरंतर चुनौती देते रहे 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने अकबर की विशाल सेना का मुकाबला किया।
वीरता और शौर्य अद्वितीय था
maharana pratap : भले ही युद्ध में उन्हें पीछे हटना पड़ा, लेकिन उनकी वीरता और शौर्य अद्वितीय था। युद्ध में घायल होने के बाद भी उनका वफादार घोड़ा चेतक उन्हें सुरक्षित स्थान तक ले गया। युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने वनवास अपना लिया, मगर कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी।
भील और जनजातियों मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया
maharana pratap : भील और अन्य जनजातियों की सहायता से उन्होंने मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए निरंतर संघर्ष किया। उनके सैनिक साहस और रणनीति के कारण मुगलों को मेवाड़ पर पूर्ण अधिकार जमाने में कामयाबी नहीं मिली। महाराणा प्रताप ने ऐश्वर्य और सुख सुविधाओं को त्याग कर स्वाभिमान को सर्वोपरि रखा।
हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप की हार हुई
maharana pratap : इतिहास में कहीं एक जगह यह लिखा गया है कि हल्दी घाटी में महाराणा प्रताप की हार हुई, पर सारे घटनाक्रम को गहराई से देखा जाए तो पता चलेगा कि यह एक शाही सेना और महाराणा की सेना के बीच 4 घंटे का संक्षिप्त संघर्ष अनिर्णित रहा, जिसमें महाराणा का पलड़ा भारी रहा और शाही सेना भयभीत थी।
महाराणा प्रताप का जीवन संघर्ष और त्याग का प्रतीक
maharana pratap : अपने जीवनकाल में भले ही वे मेवाड़ को पूर्ण रूप से मुक्त न करा सके, परन्तु उन्होंने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष की अलख जगाई। मेवाड़ के शेर के रूप में विख्यात महाराणा प्रताप का जीवन संघर्ष और त्याग का प्रतीक है। वीर-श्रेष्ठ महाराणा के कार्य आज भी मेवाड़ की एक-एक पुस्तक और साहित्य में वर्तमान समय में जान पड़ते हैं।
प्रताप के वीरत्व और यषोगान के अनेक ग्रंथ बन चुके
maharana pratap : आज भी उनके वीर कार्यों की कथाएं और गीत प्रत्येक मेवाड़ी के हृदय में उत्तेजना पैदा करते हैं। महाराणा का नाम न सिर्फ राजपूताने में बल्कि पूरे भारतवर्ष में अत्यंत आदर और श्रद्धा से लिया जाता है। अंग्रेजी व भारतवर्ष की प्रायः सभी भाषाओं में प्रताप के वीरत्व और यषोगान के अनेक ग्रंथ बन चुके हैं। –आईएएनएस डीसीएच/वीसी
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(यह खबर आईएएनएस समाचार एजेंसी के जरिए ली गई है। हिंद मित्र इसकी सामग्री के लिए जिम्मेदार नहीं है।)
















