रायपुर, 21 अगस्त । chhattisgarh ne dikhai rah : पोषण अधिकारी से एक एकड़ भूमि पर खेती करने वाले किसान बने एक व्यक्ति की यात्रा से लेकर राष्ट्रीय पर्माकल्चर सम्मेलन में भाग लेने वाले छत्तीसगढ़ के 29 किसानों तक, छत्तीसगढ़ आज उस कृषि-भविष्य की झलक प्रस्तुत कर रहा है, जहाँ किसान प्रकृति से संघर्ष नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए खेती करते हैं। यह उस देशव्यापी पुनर्योजी कृषि आंदोलन की कहानी है, जो धीरे-धीरे अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है ।
प्रकृति की बुद्धिमत्ता का सम्मान अधिक करना होगा
chhattisgarh ne dikhai rah : दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने कहा, “हमें प्रकृति की बुद्धिमत्ता का सम्मान मानव के लोभ से अधिक करना होगा।”
“क्या मैं अपने बेटे को वही प्राकृतिक वातावरण दे पाऊँगा, जो मेरे पिता ने मुझे दिया था?”
chhattisgarh ne dikhai rah : यह प्रश्न छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में अपनी एक एकड़ भूमि पर खेती करते अविनाश लूंबा के साथ हर दिन रहता है। यह उस व्यक्ति का प्रश्न है, जो अपने पीछे ऐसी मिट्टी छोड़ जाना चाहता है जिसमें जीवन स्पंदित हो, ऐसा अन्न जो रसायनों के स्पर्श से मुक्त हो और ऐसी हवा हो, जिसमें उसका बेटा निश्चिंत होकर साँस ले सके।

राष्ट्रीय पर्माकल्चर सम्मेलन
chhattisgarh ne dikhai rah : हाल ही में बेंगलुरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग अंतर्राष्ट्रीय केंद्र में आयोजित राष्ट्रीय पर्माकल्चर सम्मेलन में, गुरुदेव श्री श्री रविशंकर की उपस्थिति में इस व्यक्तिगत प्रश्न को एक व्यापक राष्ट्रीय मंच मिला। गुरुदेव देशभर में पुनर्योजी कृषि की इस पद्धति को लोकप्रिय बनाने के अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमें प्रकृति की बुद्धिमत्ता का सम्मान मानव के लोभ से अधिक करना होगा।”
आर्ट ऑफ लिविंग का कार्य लोगों को जोड़ना
chhattisgarh ne dikhai rah : कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न अंगों के बीच सुदृढ़ संबंध स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए गुरुदेव ने कहा, “आर्ट ऑफ लिविंग का कार्य लोगों को जोड़ना है। बैंक को किसान से जोड़ना, उपभोक्ता को उत्पादक से जोड़ना। जब हम सभी को जोड़ते हैं, तब पूरे समाज को उसका लाभ मिलता है।”
गुरुदेव ने पृथ्वी को एक जीवंत और श्वास लेती हुई सत्ता
chhattisgarh ne dikhai rah : इस सम्मेलन में किसान, कृषि विशेषज्ञ और खेती की नई राह तलाश रहे अनेक उत्साही लोग एकत्र हुए। उद्देश्य था यह समझना कि पुनर्योजी कृषि किस प्रकार भोजन को अधिक सुरक्षित, खेतों को अधिक आत्मनिर्भर और खेती को आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ बना सकती है।
खेती की व्यावहारिक चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा
chhattisgarh ne dikhai rah : सम्मेलन में खेती की व्यावहारिक चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा हुई, भूमि और जल प्रबंधन से लेकर अर्थव्यवस्था, बाजार, सरकारी सहयोग और ऐसी कृषि व्यवस्था के निर्माण तक, जिससे किसान के लिए खेती एक आर्थिक रूप से सुदृढ़ और सम्मानजनक आजीविका बन सके।
कृषि उन प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त न करे
chhattisgarh ne dikhai rah : पर्माकल्चर का मूल आग्रह यही है कि कृषि उन प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त न करे, जिन पर उसका अस्तित्व टिका है। मिट्टी, जल, बीज, वृक्ष, जीव-जंतु और मानव, इन सभी को एक ही जीवंत तंत्र के परस्पर जुड़े हुए अंगों के रूप में देखा जाता है। हर मौसम बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय ऐसे खेतों की रचना की जाती है, जहाँ प्रकृति की अपनी प्रक्रियाएँ मिट्टी को उर्वर बनाएँ, वर्षाजल को संचित करें, जैव-विविधता को बढ़ावा दें और खेती की लागत को कम करें।
छत पर हो, घर के आँगन में
chhattisgarh ne dikhai rah : उपभोक्ताओं के लिए भी इसका एक गहरा अर्थ है। अपने भोजन का कुछ अंश स्वयं उगाना, चाहे वह छत पर हो, घर के आँगन में, सामुदायिक भूखंड में या खेत में, हमें इस बात पर अधिक नियंत्रण देता है कि हमारा भोजन किस प्रकार पैदा हो रहा है। साथ ही, यह हमारी रसोई और उस धरती के बीच का संबंध पुनः स्थापित करता है, जहाँ से हमारा अन्न आता है।
लूंबा की यात्रा अनेक प्रेरक कहानियों में से एक
chhattisgarh ne dikhai rah : पोषण अधिकारी से पर्माकल्चर किसान बने लूंबा की यात्रा इस उभरते आंदोलन की अनेक प्रेरक कहानियों में से एक है। उनकी यात्रा किसी खेत से नहीं, बल्कि सरकारी सेवा के वर्षों से शुरू हुई। अपने कार्यकाल में जिन किसानों से उनका संपर्क हुआ, उन्हीं के माध्यम से वे कृषि की दुनिया को समझने लगे।

भोजन पैदा कहाँ से होता है?
chhattisgarh ne dikhai rah : उनके मन में एक प्रश्न उठने लगा, “यदि मैं लोगों को यह बता रहा हूँ कि स्वस्थ भोजन क्या है, तो क्या मुझे यह भी नहीं समझना चाहिए कि वह भोजन पैदा कहाँ से होता है?” भूमि की तलाश उन्होंने 2016 में शुरू की और वर्षों के प्रशिक्षण एवं तैयारी के बाद 2023 में जाकर भूमि खरीदी। आज उनकी एक एकड़ भूमि पर औषधीय पौधों से लेकर फलदार वृक्षों तक तीन सौ से अधिक प्रकार के उत्पाद उगाए जाते हैं।
आज वे कहते हैं, “पैसा लगाने से पहले समय लगाइए। यदि आप प्रतीक्षा करने और मिट्टी तथा पौधों को ध्यान से देखने के लिए तैयार हैं, तो भूमि स्वयं आपको बता देगी कि उसे क्या चाहिए।” लूंबा की कहानी उस व्यापक पर्माकल्चर आंदोलन की अनेक कहानियों में से एक है, जिसे आर्ट ऑफ लिविंग देशभर में आकार दे रहा है। और इस आंदोलन में छत्तीसगढ़ एक सशक्त अध्याय के रूप में उभर रहा है।
ऐसे ही एक किसान हैं यश मिश्रा, जिन्होंने लगभग 2015 में पर्माकल्चर का प्रशिक्षण लिया। उनकी समझ की शुरुआत एक छोटी, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण बात से हुई—“मिट्टी में कार्बन होना आवश्यक है। उसमें करोड़ों जीवाणुओं का होना भी उतना ही आवश्यक है।”
chhattisgarh ne dikhai rah : प्रशिक्षण से पहले उनके खेत में भी आसपास के अधिकांश खेतों की तरह एक समय में केवल एक ही फसल उगाई जाती थी। लेकिन बहुस्तरीय खेती और रसोई के जैविक अपशिष्ट को मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए उपयोग करने की विधि सीखने के बाद उनके खेत की तस्वीर ही बदल गई।
वे बताते हैं, “आज हम एक साथ 9 से 11 फसलें उगाते हैं।” अब उनकी आय वर्ष में केवल एक अनिश्चित फसल पर निर्भर नहीं रहती। वह छह से सात महीनों तक निरंतर बनी रहती है।
वे कहते हैं, “मेरी भूमि सोना उगलने लगी है।”
chhattisgarh ne dikhai rah : उनकी मिट्टी में केंचुए लौट आए हैं। खेतों में पक्षियों की चहचहाहट फिर सुनाई देने लगी है। यहाँ तक कि साँप भी अब उनके उस वर्णन का हिस्सा हैं, जिसमें वे एक स्वस्थ और संतुलित खेत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
वे कहते हैं, “किसानों के लिए साँप भी महत्वपूर्ण है।”
chhattisgarh ne dikhai rah : लूंबा और मिश्रा जैसी कहानियाँ ही वह प्रेरणा हैं, जिनके कारण आर्ट ऑफ लिविंग ने इस वर्ष के सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के 29 आदिवासी किसानों को भाग लेने के लिए सहयोग दिया। ये वे किसान हैं, जो लंबे समय से अपने स्तर पर रसायन-मुक्त खेती कर रहे थे, अक्सर बिना पर्याप्त सहयोग, मार्गदर्शन या ऐसे नेटवर्क के, जिस पर वे आगे बढ़ने के लिए भरोसा कर सकें। सम्मेलन से जुड़े दल ने इन किसानों की विशेष रूप से पहचान की, क्योंकि उन्हें अपनी अगली यात्रा के लिए तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और सतत सहयोग की आवश्यकता थी।
बेंगलुरु लाने का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं था
chhattisgarh ne dikhai rah : उन्हें बेंगलुरु लाने का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं था। उद्देश्य था उन्हें उन बाजारों से जोड़ना, जहाँ वे अकेले पहुँच नहीं बना सकते थे; उन्हें एक-दूसरे से जोड़ना और उनके अनुभवों को साझा मंच प्रदान करना। इनमें से अधिकांश किसान समान स्थानीय समुदायों से आते हैं। इसलिए उनके प्रशिक्षण का प्रभाव केवल उनके व्यक्तिगत खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, वह उनके गाँवों तक पहुँचेगा और वहाँ से आगे फैलता जाएगा।
भूमि, जल और बाजार तक पहुँच
chhattisgarh ne dikhai rah : यही सोच स्वयं इस सम्मेलन की संरचना में भी दिखाई देती है। भूमि, जल और बाजार तक पहुँच जैसे विषयों पर सत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए तैयार किए गए, जो इस यात्रा के बिल्कुल आरंभिक चरण में हैं।वे लोग जो आज भी स्वयं से पूछ रहे हैं कि “शुरुआत आखिर कहाँ से करें?”
भूमि का चुनाव कैसे करें
chhattisgarh ne dikhai rah : ऐसे प्रश्नों के उत्तर तलाशे गए, ऐसी भूमि का चुनाव कैसे करें, जो वर्षों तक पानी को सँभाल सके और खेत को जीवन दे सके? ऐसी कृषि-योजना कैसे बनाई जाए, जहाँ किसान की आय उस वर्षा पर पूरी तरह निर्भर न हो, जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सकता?
यही पर्माकल्चर का सार है, प्रकृति को जीतना नहीं, उसे समझना; उससे लेना नहीं, उसके साथ मिलकर सृजन करना। यह केवल खेती की कोई तकनीक नहीं, बल्कि धरती, किसान और भोजन के बीच टूटते संबंध को पुनः जीवित करने की एक व्यापक दृष्टि है।
Read More : श्रमिकों के सशक्तिकरण का नया दौर: छत्तीसगढ़ में श्रम कल्याण को मिल रही नई गति














