बस्तर गोंचा पर्व 2026: पहली बार भगवान जगन्नाथ को 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी

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Bastar Goncha Parva
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जगदलपुर। Bastar Goncha Parva 2026: बस्तर की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले गोंचा महापर्व ने इस वर्ष एक नया इतिहास रच दिया। करीब 619 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में पहली बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी दी गई।

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Bastar Goncha Parva 2026: जैसे ही भगवान रथ पर विराजमान हुए, तुपकियों की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा

जैसे ही भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा रथ पर विराजमान हुए, तुपकियों की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। हजारों श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनकर जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ उत्सव में भागीदारी निभाई।

इस वर्ष का आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक लोक संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ने का भी माध्यम बना। पहली बार एक साथ 100 युवाओं द्वारा पारंपरिक तुपकी से भगवान जगन्नाथ को सलामी देने का दृश्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।

गोंचा महापर्व की शुरुआत भगवानके नेत्रोत्सव और चांदी के झाड़ू से होने वाली छेरा-पोहरा रस्म के साथ हुई

Bastar Goncha Parva 2026: गोंचा महापर्व की शुरुआत परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ के नेत्रोत्सव और चांदी के झाड़ू से होने वाली छेरा-पोहरा रस्म के साथ हुई। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा को उनके अलग-अलग रथों पर विराजमान किया गया।

रथारोहण के तुरंत बाद 100 युवाओं ने एक साथ पारंपरिक तुपकियों से भगवान को सलामी दी। तुपकियों की सामूहिक गूंज ने पूरे आयोजन को अद्भुत और ऐतिहासिक बना दिया।

रथारूढ़ होने के बाद तीनों विग्रह श्रद्धालुओं के जयघोष के बीच सिरहासार स्थित जनकपुरी के लिए प्रस्थान करते हैं

Bastar Goncha Parva 2026: बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने बताया कि “ओडिशा के पुरी की तर्ज पर जगदलपुर में भी भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ को तीन अलग-अलग रथों में विराजमान कर भव्य रथयात्रा निकाली जाती है.

रथारूढ़ होने के बाद तीनों विग्रह श्रद्धालुओं के जयघोष के बीच सिरहासार स्थित जनकपुरी के लिए प्रस्थान करते हैं. जहां 9 दिनों तक भक्तों को दर्शन देते हैं. बस्तर में यह परंपरा करीब 600 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है और आज भी उसी श्रद्धा, आस्था और राजपरंपरा के साथ इसका निर्वहन किया जाता है.”

Bastar Goncha Parva 2026: गोंचा महापर्व की सबसे अनूठी पहचान तुपकी की परंपरा है, जो केवल बस्तर ही नहीं बल्कि दुनिया की अपनी तरह की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत मानी जाती है।

पहले इस पर्व के दौरान लोग एक-दूसरे पर पेंग यानी मलकांगिनी के बीज से तुपकी चलाते थे

Bastar Goncha Parva 2026:  पहले इस पर्व के दौरान लोग एक-दूसरे पर पेंग यानी मलकांगिनी के बीज से तुपकी चलाते थे। लोकमान्यता के अनुसार इस बीज में औषधीय गुण होते हैं और इसका रस शरीर को अनेक बीमारियों से बचाने में सहायक माना जाता था। इसी कारण यह परंपरा केवल उत्सव का हिस्सा नहीं, बल्कि लोकविश्वास और स्वास्थ्य से भी जुड़ी रही है।

इस परंपरा के बारे में कमलचंद्र भंजदेव ने कहा, “तुपकी की परंपरा केवल बस्तर की पहचान नहीं, बल्कि दुनिया में अपनी तरह की अनूठी सांस्कृतिक विरासत है. पहले गोंचा महापर्व में लोग एक-दूसरे पर पेंग यानी मलकांगिनी के बीज से तुपकी चलाते थे.

लोकमान्यता के अनुसार इस बीज में औषधीय गुण होते हैं और इसका रस शरीर को कई बीमारियों से बचाने में सहायक माना जाता था.

Bastar Goncha Parva 2026: यही कारण है कि तुपकी केवल उत्सव का हिस्सा नहीं, बल्कि लोकविश्वास, स्वास्थ्य और परंपरा का भी प्रतीक रही है.”

इस वर्ष पहली बार भगवान के समक्ष 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी देने की पहल युवा समिति ने की

Bastar Goncha Parva 2026: इस वर्ष पहली बार भगवान जगन्नाथ के समक्ष 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी देने की पहल युवा समिति ने की। इस पहल का उद्देश्य बस्तर की इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को नई पहचान देना और इसे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना था।

युवा समिति के सदस्य शिवांश पाणिग्राही ने कहा, “वर्ष 2026 में पहली बार भगवान जगन्नाथ के समक्ष 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी देने का निर्णय लिया गया. तुपकी बस्तर की अमूल्य धरोहर है, जिसे संरक्षित करना हर बस्तरवासी की जिम्मेदारी है.

Bastar Goncha Parva 2026:  इसी उद्देश्य से एक साथ 100 युवाओं ने सलामी देकर इस परंपरा को विश्व पटल तक पहुंचाने का प्रयास किया. इस ऐतिहासिक पहल के पीछे युवाओं की सोच और उत्साह सबसे बड़ी ताकत रही.”

100 तुपकियों की सामूहिक सलामी का विचार युवाओं की अपनी पहल

Bastar Goncha Parva 2026: इस आयोजन की तैयारी और युवाओं की भूमिका पर युवा समिति के सदस्य शिवम जोशी ने कहा, “100 तुपकियों की सामूहिक सलामी का विचार युवाओं की अपनी पहल थी.

उनका उद्देश्य रथयात्रा के दौरान ऐसा ऐतिहासिक और भव्य दृश्य प्रस्तुत करना था, जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने. युवाओं के सामूहिक प्रयास और समर्पण से यह आयोजन सफल हुआ और गोंचा महापर्व के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया.”

इस वर्ष का गोंचा महापर्व आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का अनूठा संगम बनकर सामने आया। 619 वर्षों से चली आ रही इस ऐतिहासिक परंपरा में पहली बार 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी ने नया अध्याय जोड़ दिया।

इस पहल ने यह संदेश भी दिया कि यदि युवा अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़कर उसे आगे बढ़ाने का संकल्प लें, तो सदियों पुरानी परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक और अधिक मजबूती के साथ सुरक्षित रह सकती हैं।

Bastar Goncha Parva 2026: यही कारण है कि वर्ष 2026 का गोंचा महापर्व अब बस्तर के इतिहास में एक विशेष और यादगार पड़ाव के रूप में दर्ज हो गया।


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