व्यंग्य : गरबे का जोश, शरीर बेहोश!

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vyangya garbe ka josh
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साहित्य /व्यंग्य 22 अक्टूबर । vyangya garbe ka josh : पहले गरबा भक्ति का माध्यम था। लोग माता की आराधना कर कुछ कदम घूमते थे, प्रसाद खाकर घर लौट आते थे। अब गरबा राष्ट्रीय स्तर का आयोजन बन गया है, जिसमें भक्ति से ज्यादा ड्रेस, डांस, फोटो और सोशल मीडिया की रीलों का महत्व है। गरबे वाली जोड़ियाँ एक दूसरे को “म्हारा सोणा रे…” गाकर मस्त हो जाती हैं। लो भाई, माता की आरती पाँच मिनट में समाप्त। माता रानी भी सोचती होंगी-“मेरे भक्तों, मेरी पूजा कर रहे हो या अपने फॉलोअर्स की संख्या बढ़ा रहे हो?” मन ही मन कहती होंगी-“बेटा, दर्शन करने आए हो या ऑडिशन देने!”

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नौ दिन तक गरबा खेलने का उत्साह

नौ दिन तक गरबा खेलने का उत्साह ऐसा कि ऑफिस में फाइलें नाचती हैं और रात में कमर। “नगाड़े संग ढोल बाजे।” की थाप सुनते ही पैरों में बिजली दौड़ती है। उम्र भले ही चालीस पार हो, लेकिन मन कहता है-“अभी तो मैं जवान हूँ!” शरीर बेचारा आवाज लगाता है-“मालिक, जवानी अपनी जगह है, मगर घुटनों की भी कोई उम्र होती है!” vyangya garbe ka josh 

गरबे के मैदान में कोई नागिन डांस

गरबे के मैदान में कोई नागिन डांस कर रहा है, कोई हेलीकॉप्टर की तरह घूम रहा है और कोई ऐसा स्टेप मार रहा है, जिसे देखकर फिजियोथेरेपिस्ट की फीस “शेर माँ करते टॉप गेर मा आ जाती है।” कुछ लोग तो इस उत्साह में इतने चक्कर लगा लेते हैं कि घर लौटते समय उन्हें जूती या चप्पल पहनने का भी होश नहीं रहता। वे अपने साथी से कहते हैं-“ऐ भई पॉलिथीन में डाल दे यार और गाड़ी तू ही चला, मैं तो पंचर हो गया हूँ।” vyangya garbe ka josh 

शरीर कोई रिचार्ज होने वाला मोबाइल नहीं

सबसे मजेदार दृश्य तब होता है, जब नौ दिन तक सोफे पर बैठकर टीवी देखने वाला व्यक्ति गरबे की पहली रात डांस का सुपरस्टार समझने लगता है। दो घंटे तक लगातार घूमने के बाद जब कमर जवाब देती है, तो उसे समझ आता है कि शरीर कोई रिचार्ज होने वाला मोबाइल नहीं है, जिसे सुबह चार्ज करके रात भर चलाया जा सके। vyangya garbe ka josh 

बीमारी शरीर में कम और गरबे के जुनून में ज्यादा

अस्पतालों में भी इन दिनों गरबे का असर दिखाई देता है। किसी की कमर में दर्द, किसी की पिंडली में खिंचाव, तो किसी के घुटने में शिकायत! डॉक्टर पूछते हैं, “कितनी देर गरबा किया?” मरीज गर्व से जवाब देता है, “डॉक्टर साहब, पूरे चार घंटे!” डॉक्टर कहते हैं, “बहुत खूब! अब अगले चार दिन आराम कीजिए।” मरीज तुरंत पूछता है, “लेकिन डॉक्टर साहब, कल फाइनल राउंड है!” डॉक्टर माथा पकड़ लेते हैं। उन्हें लगता है कि बीमारी शरीर में कम और गरबे के जुनून में ज्यादा है।

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विजयादशमी पर अपनी अकड़ी हुई कमर का दहन न करवाएँ

असल समस्या गरबा नहीं, बल्कि जोश में होश खो देना है। मगर शरीर की क्षमता को नजरअंदाज करके लगातार घंटों नाचना समझदारी नहीं है। आखिर माता रानी भी यही चाहेंगी कि उनके भक्त नौ दिन आनंद से गरबा करें और दसवें दिन भंडारा सूत लें। विजयादशमी पर अपनी अकड़ी हुई कमर का दहन न करवाएँ! हे भक्तों गरबा जरूर खेलिए, जमकर खेलिए,  इस तरह नहीं कि अगले दिन आपकी पिंडली आपको देखकर कहे—”बस मालिक, अब अगले नवरात्रि में मिलेंगे!”

 

 

 


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