क्या ग्रह सच में तारों का चक्कर लगाते हैं? जानिए बेरीसेंटर का विज्ञान

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kya grah sach taron chakkar
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नई दिल्ली, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। kya grah sach taron chakkar :  हम अक्सर पढ़ते हैं कि ग्रह अपने तारों का चक्कर लगाते हैं, लेकिन विज्ञान की नजर में यह पूरी तरह सही नहीं है। असल में ग्रह और तारे दोनों एक साझा बिंदु के चारों ओर घूमते हैं, जिसे “बेरीसेंटर” कहा जाता है।

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नए ग्रहों की खोज में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका

kya grah sach taron chakkar :  यही अवधारणा स्पेस साइंस को समझने और नए ग्रहों की खोज में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बेरीसेंटर को सरल भाषा में समझें तो यह किसी भी दो या उससे अधिक वस्तुओं का संयुक्त द्रव्यमान केंद्र यानी सेंटर ऑफ मास होता है। हर वस्तु का अपना द्रव्यमान केंद्र होता है- वह बिंदु जहां उसका पूरा भार संतुलित किया जा सकता है।

ज्यादा भारी हिस्सा की दिशा में खिसक जाता है द्रव्यमान 

kya grah sach taron chakkar :  उदाहरण के लिए, एक साधारण रूलर को उंगली पर संतुलित करने से उसका द्रव्यमान केंद्र आसानी से पता चल जाता है। हालांकि, सभी वस्तुओं का द्रव्यमान केंद्र उनके ठीक बीच में नहीं होता। यदि किसी वस्तु का एक हिस्सा ज्यादा भारी है, तो उसका द्रव्यमान केंद्र उसी दिशा में खिसक जाता है। यही सिद्धांत अंतरिक्ष में भी लागू होता है।

अंतरिक्ष में जब दो खगोलीय पिंड

kya grah sach taron chakkar :  अंतरिक्ष में जब दो खगोलीय पिंड- जैसे कोई ग्रह और तारा एक-दूसरे के गुरुत्वाकर्षण से बंधे होते हैं, तो वे किसी एक के चारों ओर नहीं, बल्कि अपने साझा द्रव्यमान केंद्र यानी बेरीसेंटर के चारों ओर घूमते हैं। आमतौर पर यह बिंदु उस पिंड के ज्यादा करीब होता है जिसका द्रव्यमान अधिक होता है।

सूर्य का द्रव्यमान पृथ्वी की तुलना में बहुत ज्यादा

kya grah sach taron chakkar :  उदाहरण के तौर पर सूर्य और पृथ्वी को लें। सूर्य का द्रव्यमान पृथ्वी की तुलना में बहुत ज्यादा है, इसलिए इन दोनों का बेरीसेंटर सूर्य के केंद्र के बेहद करीब होता है। इसी कारण हमें लगता है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है। लेकिन मामला तब दिलचस्प हो जाता है जब हम बृहस्पति को देखते हैं।

बृहस्पति का द्रव्यमान बहुत अधिक

kya grah sach taron chakkar :  बृहस्पति का द्रव्यमान बहुत अधिक है, जिसके कारण उसका और सूर्य का बेरीसेंटर सूर्य के बाहर स्थित हो सकता है। ऐसे में सूर्य खुद भी हल्का-सा “डगमगाता” हुआ दिखाई देता है। दरअसल, हमारे पूरे सौरमंडल का भी एक सामूहिक बेरीसेंटर होता है, जिसके चारों ओर सभी ग्रह और सूर्य घूमते हैं।

ग्रहों की स्थिति के अनुसार बदलता रहता

kya grah sach taron chakkar : यह बिंदु स्थिर नहीं रहता, बल्कि ग्रहों की स्थिति के अनुसार बदलता रहता है। कभी यह सूर्य के अंदर होता है, तो कभी उसकी सतह के बाहर। बेरीसेंटर की यही अवधारणा खगोलविदों को सौरमंडल के बाहर के ग्रहों जिन्हें एक्सोप्लैनेट कहा जाता है को खोजने में मदद करती है।

kya grah sach taron chakkar :  घूमने वाले ग्रहों को सीधे देख पाना बेहद मुश्किल होता

 दूर स्थित तारों के चारों ओर घूमने वाले ग्रहों को सीधे देख पाना बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि उनकी चमक अपने तारे की रोशनी में छिप जाती है। ऐसे में वैज्ञानिक उस तारे की हल्की “डगमगाहट” को मापते हैं। यह डगमगाहट इस बात का संकेत होती है कि तारे के चारों ओर कोई ग्रह मौजूद है और दोनों एक साझा बेरीसेंटर के चारों ओर घूम रहे हैं।

तकनीक की मदद से अब तक हजारों एक्सोप्लैनेट की खोज

kya grah sach taron chakkar :  इसी तकनीक की मदद से अब तक हजारों एक्सोप्लैनेट की खोज की जा चुकी है। इस तरह, बेरीसेंटर न केवल हमारे सौर मंडल की गति को समझने में मदद करता है, बल्कि यह ब्रह्मांड में नए ग्रहों की खोज का एक अहम आधार भी बन चुका है। –आईएएनएस एमटी/एएस


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(यह खबर आईएएनएस समाचार एजेंसी के जरिए ली गई है। हिंद मित्र इसकी सामग्री के लिए जिम्मेदार नहीं है।)