रायपुर। Sanghara: साहित्य, संवाद और सृजन की नई पहल ‘संघरा’ की प्रथम साहित्यिक बैठकी का आयोजन उत्साह और आत्मीयता के वातावरण में संपन्न हुआ।
Sanghara: छत्तीसगढ़ी शब्द ‘संघरा’ का अर्थ है – साथ चलना, साथ सीखना और एक-दूसरे को आगे बढ़ाना
छत्तीसगढ़ी शब्द ‘संघरा’ का अर्थ है – साथ चलना, साथ सीखना और एक-दूसरे को आगे बढ़ाना। इसी मूल भावना को केंद्र में रखकर आयोजित इस बैठक में शहर के युवा एवं वरिष्ठ रचनाकार एक मंच पर एकत्रित हुए और अपनी मौलिक रचनाओं का पाठ किया।
यह आयोजन केवल काव्य-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि साहित्यिक संवाद, विचार-विमर्श और रचनात्मक आदान-प्रदान का भी माध्यम बना।
Sanghara: आयोजकों ने बताया कि ‘संघरा’ (Sanghara) के माध्यम से नियमित साहित्यिक बैठकों, कार्यशालाओं और संवाद सत्रों का आयोजन किया जाएगा, जिससे नए और अनुभवी रचनाकारों को परस्पर सीखने और अपने सृजन को नई दिशा देने का अवसर मिल सके।
Sanghara: कार्यक्रम में कवियों ने प्रेम, विरह, सामाजिक सरोकार, जीवन-दर्शन और आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया –

- इरफ़ानुद्दीन इरफ़ान ने प्रेम और सामाजिक बंधनों की पीड़ा को स्वर देते हुए कहा—
प्रेम किया तो प्रेम शिखर पर यूँ शोभित हो जाना था,
वो मुस्लिम ना बन पायी तुमको पंडित हो जाना था।
तुमने अपने मान की ख़ातिर झूठ का साथ दिया लेकिन,
इससे बेहतर भरी सभा में अपमानित हो जाना था।”
- भरत द्विवेदी ने प्रेम के जीवन में आने से बदलती अनुभूतियों को अपनी पंक्तियों में व्यक्त किया—
जो अधरों को न छू पाया ऐसा गीत रहा हूँ मैं,
इस दुनिया के मेले में भी मेरा मीत रहा हूँ मैं।
जब तुम न थे तो लगता था केवल बीत रहा हूँ मैं,
अब तुम मेरे संग हो तो ये दुनिया जीत रहा हूँ मैं।”
- आरव शुक्ला ने राधा-कृष्ण के विरह भाव को अपनी रचना में सजीव किया—
नयन में आज भी वो ही पुराने ख़्वाब बसते हैं,
दुबारा देखने उसको नयन हरपल तरसते हैं।
कहा राधा ने उद्धव से, बता देना मुरारी को,
कन्हैया छल गया कहकर यहाँ सब लोग हँसते हैं।”
- शंकर्षण मिश्रा ने रिश्तों में बदलते भावों और संवेदनाओं को शब्द देते हुए कहा—
दिल दुखाना किसी का बुरी बात है,
यूँ बदल जाना जानां बुरी बात है।
गैर की महफिलों में संवरना तेरा,
हमको आकर जलाना बुरी बात है।”
- मनोज शुक्ला ने सामाजिक चेतना और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की—
अपनों से बच के रहना पराए घाव नहीं देते,
प्रदूषण तो ये शहर देते हैं मेरे गाँव नहीं देते।
और सड़क किनारे एक पेड़ लगाओ यारों,
ये बिजली के खंभे किसी को छाँव नहीं देते।”
- आमना मीर ने जीवन की क्षणभंगुरता को अपनी पंक्तियों में अभिव्यक्त किया—
हर एक पल खुशनुमा नहीं होगा,
सुकूं से भरा ये समा नहीं होगा।
जी लो जितना जी सको इन पलों को,
जो अभी है साथ कल यहाँ नहीं होगा।”
- वहीं ईशान शर्मा ने माँ काली के रौद्र एवं दिव्य स्वरूप का ओजस्वी चित्रण करते हुए अपनी रचना सुनाई—
दयनीय दशा को देख देवों की दयालु देवी,
कृपा कर कष्टों का निदान करने लगी।
कर में कटार धर कलर-कलर कर,
कालिका कराली रक्त पान करने लगी।”
कार्यक्रम के अंत में सभी साहित्यकारों ने ‘संघरा’ (Sanghara) की इस पहल को साहित्यिक जगत के लिए एक सकारात्मक और रचनात्मक शुरुआत बताया।
Sanghara: उपस्थित रचनाकारों ने विश्वास व्यक्त किया कि यह मंच आने वाले समय में नवोदित और स्थापित साहित्यकारों के बीच एक सशक्त सेतु बनकर उभरेगा तथा साहित्यिक सृजन की नई संभावनाओं को जन्म देगा।
Read More : सहकारिता आंदोलन को जनभागीदारी का महाअभियान बना रही है साय सरकार- केदार कश्यप
















