आरी तुतारी व्यंग; कुलदीप शुक्ला । Ari Tutari My Chhattisgarh : छत्तीसगढ़ में विकास को लेकर सरकार के दावे लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत पर सवाल भी उतनी ही तेज़ी से उठ रहे हैं। सड़क निर्माण से लेकर जल जीवन मिशन, लोक निर्माण विभाग, नगरीय निकाय, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, खनिज विभाग, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और आवास लगभग हर विभाग में कामकाज की रफ्तार और गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में विकास को लेकर सरकार के दावों पर लगता आरोप
Ari Tutari My Chhattisgarh : सड़कों की हालत बदहाल है, जल जीवन मिशन में नल तो लगे हैं लेकिन पानी नहीं, पीडब्ल्यूडी के निर्माण कार्य समय पर पूरे नहीं हो रहे। नगरीय निकायों में सफाई, पेयजल और स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर जनता परेशान है। शिक्षा विभाग में स्कूल भवन और शिक्षकों की कमी, वहीं स्वास्थ्य विभाग में अस्पतालों की अव्यवस्था और संसाधनों का अभाव चर्चा में है। खनिज और राजस्व से जुड़े मामलों में पारदर्शिता को लेकर भी आरोप लगते रहे हैं।
सेनेटरी पैड खरीदी को लेकर गंभीर सवाल
Ari Tutari My Chhattisgarh : छत्तीसगढ़ सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में सेनेटरी पैड खरीदी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि सरकार के अधिकृत प्लेटफॉर्म GeM (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) और छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियमों की अनदेखी करते हुए प्रदेश के करीब 350 स्कूलों के लिए 35 लाख से अधिक सेनेटरी पैड खरीदे गए, जिससे शासन को लाखों रुपये के नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
Ari Tutari My Chhattisgarh : सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह ऑर्डर न तो किसी सेनेटरी पैड निर्माता कंपनी को दिया गया और न ही किसी पंजीकृत मेडिकल सप्लायर को। बताया जा रहा है कि यह सप्लाई सरगुजा संभाग के कोरिया जिले के एक फर्नीचर सप्लायर को दे दी गई, जो अपने आप में खरीद प्रक्रिया और गुणवत्ता मानकों पर सवाल खड़े करता है।
विकास का लाभ कागज़ों और फाइलों तक सीमित है, जबकि ज़मीन पर जनता को राहत नहीं मिल रही। वहीं सरकार का दावा है कि सभी विभागों में योजनाएं चल रही हैं और विकास निरंतर जारी है। सवाल यही है कि यह विकास जनता की ज़िंदगी में कितना उतर रहा है—और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।
स्वास्थ्य विभाग में दवाइयों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल
Ari Tutari My Chhattisgarh : स्वास्थ्य विभाग में दवाइयों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो ते रहे हैं। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में वितरित की जा रही दवाओं की क्वालिटी पर संदेह जताया जा रहा है, जिससे आम मरीजों की सेहत के साथ सीधा खिलवाड़ होने की आशंका बढ़ गई है।
साल 2025 के आंकड़ों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जांच में दो दर्जन से अधिक दवाओं के सैंपल फेल पाए गए हैं, जबकि इन दवाओं की सप्लाई पहले ही अस्पतालों में हो चुकी थी और बड़ी संख्या में मरीज उनका सेवन कर चुके थे।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन दवाओं में बच्चों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक और गर्भवती महिलाओं के लिए जरूरी दवाएं भी शामिल हैं। जांच रिपोर्ट के मुताबिक कई दवाओं में आवश्यक सॉल्ट मानक से कम पाया गया, वहीं कुछ दवाओं के गंभीर साइड इफेक्ट भी सामने आए हैं।
यह मामला न सिर्फ दवा आपूर्ति व्यवस्था की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि बिना गुणवत्ता जांच के दवाएं मरीजों तक कैसे पहुंचीं?
Ari Tutari My Chhattisgarh : ऐसा ही हाल लगभग सभी विभागों देखने को मिल रहा है
ऐसा ही हाल अब लगभग सभी विभागों में देखने को मिल रहा है। कहीं खरीद प्रक्रियाओं पर सवाल हैं, कहीं गुणवत्ता से समझौता, तो कहीं नियमों को ताक पर रखकर फैसले किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, निर्माण कार्य, आपूर्ति—हर जगह प्रक्रिया से ज़्यादा प्रभाव और जवाबदेही से ज़्यादा खानापूर्ति दिखाई देती है।
सरकार के शून्य भ्रष्टाचार और जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि योजनाएं कागज़ों में चमकती हैं, लेकिन धरातल पर उनकी धार कुंद नजर आती है। विभागीय निगरानी तंत्र सवालों के घेरे में है और शिकायतों के बावजूद स्पष्ट कार्रवाई का अभाव दिखता है।
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