नई दिल्ली, 27 मार्च । vata pitta kapha : स्नान हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है, लेकिन इसके सही तरीके और फायदे के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, स्नान केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि मन और शरीर दोनों को शांति देने का माध्यम है। यह शरीर के तीनों दोष वात, पित्त और कफ—को संतुलित करने में भी मदद करता है।
स्नान के लिए पानी का चयन
vata pitta kapha : हर व्यक्ति की प्रकृति अलग होती है, इसलिए स्नान के लिए पानी का चयन भी उसी अनुसार करना चाहिए। आयुर्वेद में बताया गया है कि अपनी प्रवृत्ति के अनुसार स्नान करने से शरीर स्वस्थ रहता है और कई बीमारियों से बचाव होता है।
वात प्रवृत्ति वाले लोग
vata pitta kapha : जिन लोगों के शरीर में रूखापन रहता है, हाथ-पैर ठंडे रहते हैं, वे वात प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसे लोगों को हमेशा गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए। साथ ही नहाने के बाद शरीर पर तेल लगाना (अभ्यंग) फायदेमंद होता है, जिससे त्वचा को नमी और पोषण मिलता है।
कफ प्रवृत्ति वाले लोग
vata pitta kapha : अगर शरीर में भारीपन, सुस्ती और बार-बार जुकाम की समस्या रहती है, तो यह कफ प्रवृत्ति का संकेत है। ऐसे लोगों को गर्म पानी से स्नान करना चाहिए। ठंडे पानी से नहाने से कफ बढ़ सकता है। साथ ही इन्हें सुबह स्नान करना बेहतर माना गया है और दोपहर के बाद नहाने से बचना चाहिए।
vata pitta kapha : पित्त प्रवृत्ति वाले लोग
जिन्हें ज्यादा गर्मी लगती है, पसीना अधिक आता है, चेहरे पर मुंहासे होते हैं या पेट में जलन रहती है, वे पित्त प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसे लोगों को सामान्य या हल्के ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए। बहुत ठंडा पानी इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है।
इस तरह, अपनी प्रकृति के अनुसार स्नान करने से शरीर स्वस्थ रहता है और दिनभर तरोताजा महसूस होता है।
(आईएएनएस)
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