आलेख :07 अक्टूबर: Film Aastha aur Bazar: फिल्म हनुमान अंश की कमाई की चर्चा पुरे देश में हो रही है, इस फिल्म ने यह बताने का प्रयास किया है कि बिना किसी बड़े कलाकार, बिना किसी बड़े बजट के भी अच्छी कमाई की जा सकती है बस आपको सही वक्त पर अपने स्क्रिप्ट को समाज में रखने का हुनर आना चाहिए. और इस वक्त भारत का समय इसके लिए सबसे अनुकूल है।
विशाल चतुर्वेदी के निर्माण और निर्देशन में बनी हनुमान अंश उनकी पहली फिल्म है. इस फिल्म ने अपने लागत 2 करोड़ से 200 गुना ज्यादा अब तक कमाई कर ली है और अभी भी इसका बाजार पर असर है।

Film Aastha aur Bazar: पंचायत वेब सीरीज के निर्देशक द्वारा निर्दशित फ़िल्म द वन
Film Aastha aur Bazar: अभी हाल ही में एक और बड़ी धार्मिक फिल्म बनी हैं द वन. पंचायत वेब सीरीज में निर्देशन का काम कर चुके दीपक कुमार मिश्रा के निर्देशन में यह भी उनकी पहली फ़िल्म हैं ।
फिल्म की कथा आनंदेश्वर द्विवेदी ने लिखी है, इस फिल्म को मैं और मेरी नौ साल की बेटी दोनों साथ में देख रहे थे उसे यह फिल्म बिल्कुल पसंद नहीं आई जबकि इस फिल्म में एंटरटेनमेंट की ठीक ठाक व्यवस्था की गई है। फिल्म की कहानी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आज के सबसे बड़े त्यौहार के रूप में मनाये जाने वाले पर्व छठ माता की कहानी पर आधारित है।
पर अभी तक इस फिल्म को जनता का वह प्यार नहीं मिला है जो हनुमान अंश को मिल रहा है, लेकिन मेरा मानना है की छठ आते-आते यह फिल्म बिहार में बहुत बड़ी कमाई करेगी।
Film Aastha aur Bazar: कहानी उत्तर प्रदेश और बिहार की आबादी पर केंद्रित हैं एवं छठ के बाजार को ध्यान में रखते हुए इसे पूरी तरह भूनाने का प्रयास किया गया है।
निर्देशक ने पूरी योजना के तहत इस फिल्म का निर्माण किया होगा
Film Aastha aur Bazar: मेरा मानना है कि निर्देशक ने पूरी योजना के तहत इस फिल्म का निर्माण किया होगा, उसे लगा होगा कि छठ तथा दिवाली पर्व के बीच वह सिनेमा जगत में बड़ी कमाई कर पाएगा फिल्म दोनों राज्यों की भावनाओं से अच्छी तरह खेल सकता है पर अभी तक उनकी मंसा कामयाब दिख नहीं रही है।
फिल्म का बजट लगभग 50 करोड़ के आसपास है और अभी तक यह फिल्म अपना बजट भी नहीं निकल पाई है. फिल्में अभिनेता और अभिनेत्री के अलावा बाकी सभी कलाकार वेब सीरीज तथा टीवी चैनलों से लिये गए हैं।
इस फिल्म के निर्माण में निर्देशक ने दो गलतियां की है. एक तो उन्होंने ऐसे कलाकार चुने जिनका बिहार तथा छठ से कोई लेना-देना नहीं है. दूसरा उसने कहानी में सीधे बिहार दिखाने का प्रयास न करके बहुत बड़ी गलती की उसे लगा शायद ऐसा करके वह इस फिल्म को वर्ल्ड वाइड बन पाएगा पर इन दोनों चीजों में वह चूक गए।
निर्देशक को चाहिए था कि फिल्म के लिए किसी भोजपुरी के बड़े कलाकार को लेते या फिर हनुमान अंश की तरह किसी नए कलाकार को और इसे पूरी तरह से बिहार की पृष्ठभूमि पर फिल्माते तों शायद ज्यादा मुनाफा प्राप्त होता.
Film Aastha aur Bazar: धार्मिक फिल्मों में भारत के इतिहास में संतोषी माता फ़िल्म को आज भी कमाई के लिहाज से मिल का पत्थर माना जाता है। 1975 में बनी इस फ़िल्म ने अपनी लागत से लगभग 20 गुना ज्यादा का मुनाफा कमाया था. इसके निर्देशक विजय शर्मा की यह पहली फिल्म थी.
इस फिल्म को कमाई के लिए नहीं बल्कि समाज में एक नई देवी की स्थापना के लिए जाना जाता है, क्योंकि इस फ़िल्म ने संतोषी माता के नाम का एक नया अवतार महिलाओं के लिए तैयार किया था. जिसने आस्था के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे. बिहार में छठी मैया के अवतार को भी इसी के समतुल्य खड़ा किया जा रहा है।
आज बिहार का सबसे बड़ा पर्व है छठ. इस पर्व के आगे होली,दिवाली, दशहरा जैसे सभी श्रद्धा के पर्व बौने हो चुके हैं. यह सब रातों रात नहीं हुआ हैं. यह सब भोजपुरी फिल्म नायको, गीतकारों, कलाकारों की बेरोजगारी के कारण हुआ है। 90 दशक के बाद जब भोजपुरी फिल्मों का अकाल हो गया तब भोजपुरी के कलाकारों के लिए कोई बड़ा काम सामने नहीं आ रहा था.
Film Aastha aur Bazar: तब इन्होंने होली के गीतों की भरमार पेश की पर इससे उनका साल भर का कार्य नहीं पूरा हो पा रहा था इसलिए उन्होंने छठ त्यौहार को अपने बाजार के रूप में देखा. शारदा सिन्हा और मालिनी अवस्थी के गीत इसके लिए मिल के पत्थर साबित हुए।
धार्मिक गीतों को जितना सुंदर मोहम्मद रफी ने गाया उतना आज भी किसी ने नहीं गाया
Film Aastha aur Bazar: संगीत को लोग श्रद्धा से जुड़कर देखते हैं लेकिन यह सब कलाकार के अभ्यास तथा गीत के बोल पर निर्भर करता है कि वह कितना प्रभावशाली होगा. धार्मिक गीतों को जितना सुंदर मोहम्मद रफी ने गाया उतना आज भी किसी ने नहीं गाया हैं.
आपको याद है आपने इधर सूफ़ी गाने कब सुने थे? भर दे झोली, या फिर निर्गुण गीत कभी भारतीय फिल्मों के शान होते थे पर अब ऐसे गीतों की फिल्म इंडस्ट्रीज में कोई जगह नहीं है।
याद कीजिए 80 के दशक में जब रामानंद सागर के रामायण प्रस्तुत होते थे तब उसका टाइटल गीत(मुखड़ा )रामचरितमानस हम सबके हृदय में बसता था पर उसी समय एक और भी जादुई धारावाहिक प्रसारित होता था ‘अलिफ़ लैला ” जिसका टाइटल गीत लोगों की जुबान पर रहता था,ईशा मसीह का धारावाहिक भी इसी दौर में प्रसारित होता था इसका टाइटल गीत भी बहुत सुंदर था,क्या अब यह सब संभव है?
Film Aastha aur Bazar: आज फिल्म की गलियारों में किसी निर्माता निर्देशक की हिम्मत नहीं कि वह सिस्टम के खिलाफ कोई बड़ी फ़िल्म बना सके. क्योंकि वह यह जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा प्रयास किया तो उनकी फिल्मों को 2 साल के लिए इस तरह सेंसर के नाम पर लटकाया जाएगा कि उसका दिवालिया निकल जाएगा।
कभी फिल्म को समाज का आईना कहा जाता था, पर आज समाज और आईना दोनों एक दूसरे से विपरीत खड़ा है
Film Aastha aur Bazar: सतलुज इसका ज्वलंत उदाहरण हैं इसलिए सभी निर्माता निर्देशक सामाजिक बदलाव और सामाजिक समस्याओं को दर किनार कर लगातार धार्मिक, प्रोपगंडा, इतिहास, ग्लैमर, हिंसा, तथा अश्लील स्क्रिप्ट से काम चला रहे हैं. इसके बाद भी कुछ नहीं समझ में आता तो पुरानी फिल्मों का रिमेक एवं पार्ट वन, टू, थ्री का खेल खेलते हैं।
कभी फिल्म को समाज का आईना कहा जाता था, पर आज समाज और आईना दोनों एक दूसरे से विपरीत खड़ा है. समाज में भुखमरी, दंगा, अपराध, मॉब लिंच, धार्मिक उन्माद, बेरोजगारी चरम पर हैं पर यह हमारे फिल्मकारों का विषय नहीं हैं।
रजनीकांत,अमिताभ बच्चन, मिथुन, सनी देयोल, अजय देवगन जैसे सुपरस्टार नायकों को महानायक बनने के पीछे कभी यही मुद्दे हुआ करते थे. अब यही नायक ऐसे फिल्म करने से डरते हैं।
Film Aastha aur Bazar: अब यह लोग सीधा-सीधा हंसाने का काम करने लगे हैं. मतलब साफ है पहले फिल्में समाज को बागी बनाती थी, व्यवस्था से सवाल करना सिखाती थी अब यह सिर्फ मनोरंजन का कार्य करने के लायक ही बचे हैं. जिसे देहाती भाषा में “भाड़” कहा जाता है. अब यह लोग यही कर रहे हैं.
आज बिहार के छठ पर्व पर हर तरह के बाजार की नज़र हैं
Film Aastha aur Bazar: आज बिहार के छठ पर्व पर हर तरह के बाजार की नज़र हैं. राजनीतिक बाजार,आर्थिक बाजार, सामाजिक बाजार, धार्मिक बाजार,गीत -संगीत बाजार, और फ़िल्म बाजार. सभी को इस पर्व के बहाने अपना अपना उल्लू सीधा करना है. किसी भी आस्था को समाज तक पहुंचाना बुरा नहीं है पर जब वह आस्था बाजार में बदल जाए और उस बाजार से आप अपना हित साधने लगे तो वह आस्था आस्था नहीं रह पाता।
बिहार में दशकों से अनेकों समस्याएं हैं,अशिक्षा, पलायन, बेगारी, जातिवाद और हर साल आने वाला बाढ़. फिल्म समाज में जन क्रांति पैदा करने का काम करती है कम से कम उन्हें इस बाजार से दूर रहना चाहिए फिर भी यदि उन्हें बिहार का छठ महापर्व दिखाई दे रहा है तो बेहतर होगा कि वे उनकी और भी समस्याओं को मुखरता से देश और दुनिया तक पहुंचाने का काम करें।
प्रकाश झा ने कभी अपहरण, गंगाजल जैसी बिहार की पृष्ठभूमि पर फिल्म बनाकर उसकी अपराधिक छवि को दुनिया के सामने रखा जिसकी वजह से वहां सत्ता में परिवर्तन नजर आए।
बिहार ने अपने सभी कलाकारों को देश और दुनिया तक पहुंचाने का काम किया है. गलियों और नुक्कड़ों में नाचने गाने वाले छोटे-मोटे कलाकारों को बिहार की जनता ने राजा बना दिया पर इन लोगों की आंखों में आज भी शर्म नहीं है.
Film Aastha aur Bazar: ऐसे ही लोगों ने “विहार”को बिहार बना दिया है.बेहतर होगा कि वर्तमान निर्माता निर्देशक उनकों बाजार समझना बंद करें और बिहार की दूसरी समस्याओं पर फिल्म बनाये ताकि बिहार के लोगों के जीवन में कुछ परिवर्तन आ सके।
आलेख – डॉ.संजीव कुमार (सामाजिक एवं राजनीतिक विशेषज्ञ)
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