गुरु वाणी,
आज कथा के माध्यम से पूज्य गुरुदेव श्री संकर्षण शरण जी (गुरु जी) ने बताए कि मनुष्य को हर पल
चैतन्य पूर्वक जीने की आवश्यकता होती है , हर मनुष्य को बर्बाद करने के लिए उसके अंदर ही बीज होते हैं हर मनुष्य का उत्थान होता है तब पतन की बीज भी होती है उत्थान अंदर चला जाता है और पतन के बीज बाहर वृक्ष बनकर उग जाते हैं ,रावण को भी उसके अहंकार (मैं ) ने मारा, भगवान राम कहते हैं कि रावण को हमने नहीं मारा अपितु वह अपने पतन का बीज स्वयं तैयार कर लिया उसके ( मैं ) ने उसे मार दिया । यह सब समाज में भी होता है अपने अहंकार के कारण लोग बर्बाद हो जाते हैं ।
अंत में सत्य की ही जीत होती है सद्गुण की जीत होती है लेकिन वर्तमान में भयभीत होते हैं,आज समाज की यही स्थिति है सद्गुणी व्यक्ति दुर्गुणों से भयभीत हो जाते हैं लेकिन अंत में सत्य की ,सद्गुण की, पवित्रता की ही जीत होती है। सभी वानर राक्षसों से भयभीत होते हैं, लेकिन हनुमानजी जो संत है जिसके अंदर कोई भी विकार नहीं है वह कभी भयभीत नहीं होते , हनुमान जी जाते है।
मेघनाथ काम के रूप में हैं ,जो संकल्प के रथ में सवार है ,और वासना जिसकी सारथी है :
काम की वजह से वासना होती है और वासना हमेशा कुछ पा लेने की इच्छा करती है मन में संकल्प ले लेते हैं मेघनाथ भी संकल्प की रथ में विराजमान हैं, और जो भगवान के शरण में होते हैं ,उसे वासना कभी प्रभावित नहीं कर सकते , वासना को समाप्त कर देते हैं । काम को मूर्छित करते हैं क्योंकि काम कभी समाप्त नहीं होता है, हनुमान जी मेघनाथ को मूर्छित कर देते हैं ।
भगवान राम के चरण का प्रभाव इतना है कि उसका सुमिरन करके हनुमान जी और अंगद जी रावण के गढ़ में प्रवेश कर जाते हैं ।
बड़भागी अंगद हनुमाना…
हनुमान जी और अंगद जी भगवान के चरण दबाते थे , और भगवान को अपने हृदय में धारण करके उनके चरण दबाए , ये दोनों बड़भागी है, मेघनाथ को जो कि वासना है , मेघनाथ को पराजित करना है तो आचरण के माध्यम से नहीं अपितु भगवान के चरण का सहारा लेकर उनका स्मरण करके पराजित किया जा सकता है ।
भगवान के चरण का सहारा लेकर वासना को समाप्त किया जा सकता है
और शत्रु भाव से ही सही जो भगवान का स्मरण कर लेते हैं भगवान उसे भी बैकुंठ पहुंचाते हैं । भगवान राम राक्षसों को भी बैकुंठ पहुंचा रहे हैं ।
जब भगवान की करुणा दृष्टि पड़ जाती है तो सारी व्यथा समाप्त हो जाती है वानरो की सारी पीड़ा समाप्त हो जाती है, लेकिन भगवान की करुणा दृष्टि पाने के लिए पहले कुप्रवृत्तियों को समाप्त करना पड़ता है ,अंदर की राक्षसी प्रवृत्ति को समाप्त करना पड़ता है, तब भगवान की करुणा दृष्टि पड़ जाती है , जब हम थक जाते हैं युद्ध करते करते तब भगवान की करुणा दृष्टि होती है और हमारी सारी व्यथा समाप्त हो जाती है। उसके लिए अंदर की कुप्रवृत्तियों को समाप्त करना पड़ता है कुप्रवृत्ति हर प्रकार से ,हर जगह समाप्त हो जाते हैं तब भगवान संभालते हैं और जब भगवान की दृष्टि पड़ती है हमारी शक्ति अपने आप बढ़ जाती है ,
काले लोगों से सावधान होने की बात भगवान के द्वारा कही गई, बाहर से काला होना यह नही, अंदर से जो काले हैं जो बाहर से सुंदर होते हैं लेकिन अंदर छल और कपट से भरे होते हैं उससे सावधान होने की आवश्यकता होती है ,जो हमेशा अंधकार में ही आज्ञान में जीता हो,
भगवान ने ऐसे लोगों से सावधान होने की बात कही है। राक्षस लोग रात में ही आक्रमण करते हैं रात मैं उनकी शक्ति बढ़ जाती है , और भगवान राम ज्ञानरूपी बाण चलाकर चारो ओर प्रकाश फैलाते हैं बुराई को समाप्त करते हैं।
अपनी गंदगी को मिटा करके भगवान की शरण में जाता है वह आचरण से भले ही गंदा हो लेकिन उसके चरण पकड़ने के लायक हो जाता है :
हनुमान जी सभी राक्षसों के पैर उठाकर के पटक रहे हैं। समाप्त कर रहे है।
ज्ञान हमेशा पवित्र होता है चाहे कोई भी दे , माल्यवंत जी बुजुर्ग हैं , रावण के नाना है ,रावण को समझाते हैं कि जब से सीता को हरण करके लाए हो हमेशा कोई ना कोई परेशानी में फंसे ही हो ,जो स्वयं जगदंबा है और स्वयं नारायण धरती पर अवतरित हुए हैं, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं है माता सीता को वापस करके भगवान के शरण में चले जाओ उन्हीं का नाम जपो तब भलाई है । लेकिन रावण किसी की बात मानने तैयार नहीं है। जब हनुमान जी जामवंत जी के बात मानते हैं और लंका में प्रवेश करते हैं तो पूरी लंका सुंदरकांड ही हो जाती है, लेकिन रावण इंकार कर देता है अपने अहंकार के कारण जहां बुजुर्गों का अपमान हो,अवहेलना हो उसकी बर्बादी निश्चित है…
इस कथा के माध्यम से यह बताया गया कि अपनी बुजुर्गों का अपमान करना ,उसका तिरस्कार करना, उसका पतन निश्चित हो जाता है । जहां बुजुर्गों का सम्मान नहीं किया जाता तब उसका पतन निश्चित हो जाता है रावण ने भी आज यही किया है। समाज के रावणी बुद्धि के लोग ऐसा ही कार्य करते हैं और अपने पतन का बीज स्वयं उगा लेते हैं, माल्यवंत जी कहते हैं कि ऐसा लगता है भगवान तुम्हें मारने की सोच ही लिए हैं । जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तो अब किसी के समझाने पर भी स्वयं का निर्णय उचित लगता है ।
मेघनाथ 10 बाण से वार करते हैं पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां वासना हमेशा 10 और से वार करता है जब ज्ञानेंद्रियां वासना से ग्रसित हो जाती है तो कर्मेंद्रिय भी वही करने लग जाती है फिर मनुष्य पतन की ओर चला जाता है । वासना से ग्रसित होकर मेघनाथ वाण बरसा रहे हैं लेकिन संत पर इसका कभी कोई प्रभाव नहीं होता। जैसे ही हनुमान जी मेघनाथ के पास जाते हैं मेघनाथ वहां से आकाश मार्ग से भागकर भगवान राम के पास जाते हैं , भगवान राम स्वयं मायापति है मायावती के पास माया का कभी कोई प्रभाव ही नहीं होता, जब मेघनाथ यह देख लेते हैं तो वह राम के सामने से चला जाता है और लक्ष्मण के पास जाते हैं, लक्ष्मण बहुत क्रोधित होते हैं और दोनों क्रोधित हैं।
क्रोध से कभी वासना को नहीं जीता जा सकता है
क्रोध से कभी काम समाप्त नहीं होती भगवान की कृपा से ,सद्गुण से, पवित्रता से काम को समाप्त कर सकते हैं । अहंकार से ,क्रोध से ,कभी समाप्त नहीं होता है, लक्ष्मण जी जाते तो है लेकिन बहुत क्रोधित होते हैं, और दोनों में युद्ध चलते रहता है अपनी विरघातिनि शक्ति का प्रयोग करके मेघनाद लक्ष्मण जी को मूर्छित कर देते हैं , मेघनाथ जी के समान एक करोड़ योद्धा लक्ष्मण जी को उठाने की कोशिश करते हैं लेकिन कोई नहीं उठा पाते , क्योंकि वह स्वयं धरती के बाहर को संभाले हुए हसि, स्वयं शेषनाग के अवतार है । लक्ष्मण जी को हनुमान जी उठाते हैं जो संत हैं ,संत ही स्पर्श कर सकता है जो सद्गुण हैं , और लक्ष्मण जी कितने भाग्यशाली हैं पहले संत की गोद में जाते हैं और जब वासना और गंदगी से मूर्छित व्यक्ति को जब संत की गोद मिल जाए वह निश्चित ही परमात्मा के गोद तक पहुंचा देते हैं । लक्ष्मण जी भगवान की गोद में होते हैं हनुमान जी अतुलित बल के धाम हैं और जैसे भगवान राम की आंख में आंसू देखते है भयंकर क्रोधित होते हैं, भगवान से कहते हैं कि आप कहे तो मैं चंद्रमा को ला देता हूँ, पताल लोक से नागों के बीच से अमृत ले आता हूं, और पूरी मौत को ही समाप्त कर देता हूं किसी की मृत्यु ही नहीं होगी। लेकिन आपके आंख में आंसू नहीं देख सकता हूं । तुलसीदास जी कहते हैं आपन तेज सम्हारो आपै तीनों लोक हांक ते काँपै….
तीनों लोक भयभीत हुए हैं अंत में जामवंत जी उसे वैद्य को लाने की बात कहते हैं,और हनुमान जी स्वयं सुषेण वैद्य को घर से उठाकर मकान सहित रात्रि में ही भगवान के सामने प्रकट कर देते हैं, सुषेण वैद्य पहले भगवान को प्रणाम करते हैं और हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने कहते हैं। जब संत की कृपा होती है करुणा दृष्टि पड़ जाती है तब हम सोए हुए होते हैं और हमें जगा देते हैं भगवान तक पहुंचा देते हैं।
















