भारत का अफगानिस्तान में 22,500 करोड़ रुपये का निवेश, माथे पर चिंता की लकीरें

काबुल
तालिबान के कब्‍जे में आने के बाद अब अफगानिस्‍तान का भविष्‍य खतरे में है. इस देश का अब क्‍या होगा कोई नहीं जानता और भारत के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं. 3 बिलियन डॉलर (करीब 22,500 करोड़ रुपये) के निवेश के बाद अब वो सभी प्रोजेक्‍ट्स अधर में आ गए हैं, जिन पर भारत और अफगान रिश्‍तों की जिम्‍मेदारी थी. भारत ने यहां पर हर सेक्‍टर में बड़ी रकम निवेश की थी. आइए आपको बताते हैं कि कौन-कौन से ऐसे प्रोजेक्‍ट्स हैं जो खतरे में आ गए हैं.
बांध से लेकर स्‍कूल और सब-स्‍टेशन तक

भारत ने तालिबान में सड़कों को निर्माण करवाया, बांध बनवाए, बिजली की लाइनों से लेकर सबस्‍टेशंस, स्‍कूल और अस्‍पतालों का निर्माण करवाया. 3 बिलियन डॉलर की मदद के साथ भारत ने अफगानिस्‍तान को फिर से खड़ा होने में सहायता मुहैया कराई. भारत और अफगानिस्‍तान के बीच साल 2011 में भारत-अफगानिस्‍तान रणनीतिक साझेदारी समझौते पर साइन हुए थे.

इस समझौते में भारत ने अफगानिस्‍तान में इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, संगठन, शिक्षा और तकनीकी स्‍तर पर मदद करने का वादा किया था. साथ ही ड्यूटी फ्री मार्केट भी अफगानिस्‍तान के लिए खोलने का भरोसा किया. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्‍यापार करीब 1 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था. नवंबर 2020 में जिनेवा में हुई अफगानिस्‍तान कॉन्‍फ्रेंस में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि अफगानिस्‍तान का कोई भी ऐसा हिस्‍सा नहीं है जिसे भारत ने नहीं छुआ है.

सलमा डैम
हेरात प्रांत में भारत की तरफ से सलमा बांध का निर्माण कराया जा रहा है. 42 मेगावॉट की क्षमता वाला यह एक हाइड्रोपावर और सिचाईं का प्रोजेक्‍ट है. कई कठिनाईयों के बावजदू इस प्रोजेक्‍ट का उद्घाटन साल 2016 में हुआ था और इसे अफगान-भारत दोस्‍ती बांध के तौर पर जाना जाता है. हेरात प्रांत अफगानिस्‍तान का सबसे खतरनाक इलाका माना जाता है. इस बांध के आसपास के इलाकों पर अब तालिबान का कब्‍जा है.

जरांज-देलाराम हाइवे
यह भी एक हाई प्रोफाइल प्रोजेक्‍ट था जिसके तहत भारत ने 218 किलोमीटर लंबा जरंज-देलाराम हाइवे का निर्माण कराया था. इस हाइवे को बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) की तरफ से तैयार किया गया है. जरंज, अफगानिस्‍तान में ईरान बॉर्डर के करीब से गुजरता है. इस हाइवे के निर्माण में 150 मिलियन डॉलर की लागत आई. हाइवे खास रुद नदी के करीब से निकलता हुआ देलाराम से जरंज तक जाता है. हाइवे दक्षिण में कंधार से, पूर्व में गजनी और काबुल से, उत्‍तर में मजार-ए-शरीफ से और पश्चिम में हेरात प्रांत से जुड़ता है.

अफगानिस्‍तान के साथ होने वाले व्‍यापार के लिए जब पाकिस्‍तान ने रास्‍ता देने से इनकार कर दिया तो यह हाइवे भारत के लिए रणनीतिक महत्‍व वाले रास्‍ते के तौर पर सामने आया. यही हाइवे ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के लिए भारत को रास्‍ता मुहैया कराता है. विदेश मंत्री जयशंकर ने पिछले साल जानकारी दी थी कि इसी हाइवे की मदद से भारत ने 75,000 टन का गेहूं कोविड-19 महामारी के दौरान चाबहार के जरिए अफगानिस्‍तान भिजवाया था. 300 भारतीय इंजीनियर और मजदूर इस हाइवे के निर्माण में लगे थे.

काबुल में संसद
90 मिलियन डॉलर की लागत से भारत ने अफगानिस्‍तान की संसद का निर्माण करवाया था. साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काबुल में इसका उद्घाटन किया था. पीएम मोदी ने इसके उद्घाटन के समय अपने भाषण में रूमी का जिक्र किया और भारत-अफगानिस्‍तान की दोस्‍ती के बारे में कई बातें कहीं. रूमी, अफगानिस्‍तान के बाल्‍ख प्रांत के रहने वाले कवि थे. पीएम मोदी ने अफगानिस्‍तान में लोकतंत्र के लिए भारत के रोल का जिक्र किया था. इस संसद में एक ब्‍लॉक का नाम पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखा गया था.

स्‍तोर पैलेस
साल 2016 में अफगान राष्‍ट्रपति अशरफ घनी और पीएम नरेंद्र मोदी ने काबुल में स्‍तोर पैलेस का उद्घाटन किया था. इस महल का निर्माण 19वीं सदी में किया गया था. साल 1919 में रावलपिंडी समझौते में इसी महल को आधार माना गया था. इसी समझौते के तहत अफगानिस्‍तान एक स्‍वतंत्र देश बन सका था. इस बिल्डिंग में साल 1965 तक अफगान विदेश मंत्री और मंत्रालय का ऑफिस था. साल 2009 में भारत, अफगानिस्‍तान और आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क के बीच एक समझौता साइन हुआ था और जिसमें महल के दोबारा निर्माण का काम फिर से शुरू किया गया. साल 2013 से 2016 के बीच में आगा खान ट्रस्‍ट फॉर कल्‍चर ने इस प्रोजेक्‍ट को पूरा किया.

पावर इंफ्रा प्रोजेक्‍ट्स
भारत ने जो और दूसरे प्रोजेक्‍ट्स अफगानिस्‍तान में शुरू किए उनमें पुल-ए-खुमरी से काबुल के उत्‍तर में जाने वाली 220 केवी की ट्रांसमिशन लाइन बिछाने जैसे दूसरे पावर इनफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट्स शामिल थे. पुल-ए-खुमरी बाघलान प्रांत की राजधानी है. ऐसे प्रोजेक्‍ट्स के तहत बिजली की सप्‍लाई को बढ़ाना एकमात्र मकसद था. साथ ही कई प्रांतों में टेलीकम्‍युनिकेशंस इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर भी मजबूत करना था.

हेल्‍थ सेक्‍टर
भारत ने काबुल में साल 1972 में खत्‍म हुए बच्‍चों के अस्‍पताल का पुर्ननिर्माण कराया था. साल 1985 में इसका नाम इंदिरा गांधी इंस्‍टीट्यूट रखा गया. यहां पर इंडियन मेडिकल मिशंस ने कई बार मुफ्त में सलाह देने का काम किया. हजारों लोग जो युद्ध में अपने अंग गंवा चुके थे, जयपुर फुट की तरफ से उन्‍हें कृत्रिम अंग लगाए गए थे. भारत ने इसके अलावा बदाखाशान, बाल्‍ख, कंधार, खोस्‍त, कुनार, ननगरहार प्रांत, निमरुज, नूरीस्‍तान, पाकटिया अइौर पक्तिका में कई क्‍लीनिक्‍स का निर्माण भी कराया.

परिवहन
विदेश मंत्रालय के मुताबिक भारत ने अफगानिस्‍तान को 400 बसें और 200 मिनी बसें, शहरी ट्रांसपोर्टेशन के लिए दी थी. इसके अलावा 105 यूटिलिटी व्‍हीकल्‍स, अफगान नेशनल आर्मी के लिए 285 मिलिट्री व्‍हीकल्‍स और पांच शहरों में अस्‍पतालों के लिए 10 एंबुलेंसेज दी थी. इसके अलावा अफगान राष्‍ट्रीय एयरलाइंस अरियाना के लिए एयर इंडिया के 3 एयरक्राफ्ट भी गिफ्ट किए गए थे.
कई और प्रोजेक्‍ट्स

भारत ने इसके अलावा स्‍कूलों के लिए डेस्‍क्‍स और बेंचेज दी और साथ ही गई गांवों में सोलर पैनल्‍स का निर्माण भी करवाया. काबुल में सुलभ शौचालय से लेकर वोकेशनल ट्रेनिंग इंस्‍टीट्यूट्स, अफगान स्‍टूडेंट्स के लिए स्‍कॉलरशिप्‍स से लेकर सिविल सर्विस के तहत कार्यक्रमों पर नजर रखना और डॉक्‍टरों के साथ कुछ और सेक्‍टर्स के लोगों को ट्रेनिंग भी मुहैया कराई.
प्रोजेक्‍ट जिन पर काम जारी है

नवंबर 2020 में जिनेवा में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि भारत ने अफगानिस्‍तान के साथ काबुल जिले में शहतूत बांध के लिए समझौता किया है. इस बांध के जरिए 20 लाख नागरिकों को पीने का पानी मुहैया कराया जाएगा. साथ ही इस बात को ऐलान भी किया कि 80 मिलियन डॉलर की लागत से करीब 100 कम्‍युनिटी डेवलपमेंट प्रोजेक्‍ट्स को भी शुरू किया जाएगा. पिछले साल भारत ने आगा खान हैरिटेज प्रोजेक्‍ट के लिए 1 मिलियन डॉलर देने का वादा किया.

इसके अलावा काबुल के दक्षिण में बाला हिसार किले को फिर से बनवाने के लिए भी कहा जो 6वीं सदी से जुड़ा है. बाला हिसार मुगल कालीन सभ्‍यता का किला है और इसके कुछ हिस्‍सों का निर्माण जहांगीर ने कराया था. कहते हैं कि एक समय में ये किला शाहजहां का घर हुआ करता था. भारत और अफगानिस्‍तान के बीच इस समय दो एयर कॉरिडोर्स हैं. ये कॉरिडोर्स काबुल-दिल्‍ली और हेरात- दिल्‍ली के तौर पर हैं.