विश्व स्तनपान सप्ताह पर शिशु के जन्म के एक घन्टे के अन्दर माँ के द्वारा स्तनपान करना जरूरी

मुरैना
स्तनपान जीवन का आधार है’ शिशु के जन्म के एक घन्टे के अन्दर मां के द्वारा स्तनपान कराना जरूरी है। मुरैना जिले में विश्व स्तनपान सप्ताह जारी है। माँ के दूध का महत्व जन-जन तक पहुँचान के उद्देश्य से वर्ल्ड अलायन्स फॉर ब्रेस्ट फीडिंग द्वारा सन् 1992 से “विश्व स्तनपान सप्ताह“ की शुरूआत की गई, जो कालांतर में विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं यूनिसेफ के तकनीकी मार्गदर्शन में दुनिया भर में 01 अगस्त से 07 अगस्त तक प्रतिवर्ष मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि 05 वर्ष से कम उम्र के आधे बच्चे पोषक तत्वों की कमी से अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते हैं और पोषक तत्वों की प्रतिपूर्ति का रामबाण तरीका जन्म काल से ही बच्चों को स्तनपान कराना है। वर्तमान में मध्यप्रदेश में प्रति वर्ष जन्म लेने वाले 14 लाख बच्चों में से केवल 4.8 लाख बच्चों को जन्म के तुरंत बाद जीवन रक्षक खीस (कोल्स्ट्रम) मिलता है। यानि 9.2 लाख बच्चे इससे वंचित रह जाते है। इनमें से केवल 8.2 लाख बच्चों को 6 माह तक केवल मां का दूध दिया जाता है, यानि 5.8 लाख बच्चे इससे वंचित रह जाते है। जन्म से 24 घंटे के बाद स्तनपान शुरू कराने से मौत का खतरा 2.4 गुना बढ़ जाता है। स्तनपान एवं ऊपरी आहार से शिशु मृत्यु दर में 19 प्रतिशत की कमी लायी जा सकती है। प्रदेश में लगभग 80.8 प्रतिशत संस्थागत प्रसव होते है। शहरी क्षेत्रों में 42.7 एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 38.0 प्रतिशत सिजेरियन होते है। इसके अलावा हमारे देश के तकरीबन 43 प्रतिशत 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे कुपोषण के शिकार है। जहां एक ओर देश में बच्चों में बौनेपन (उम्र के हिसाब से ऊंचाई में कमी) की स्थिति 38 प्रतिशत के लगभग है, वहीं मध्यप्रदेश में 42 प्रतिशत बच्चे (पांच वर्ष से कम आयु ) के बौनेपन के शिकार हैं। अगर गभीर कुपोषण को लें तो देशभर में 7 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं, तो म0प्र0 में यही आंकडा पांच साल से कम बच्चों का 09 प्रतिशत से अधिक है।

कुल मिलाकर प्रदेश का पोषण मानचित्र काफी चिंताजनक है। कुपोषण की स्थिति सुधारने का सबसे कारगर तरीका सर्वोत्तम शिशु एवं बाल आहार व्यवहारों का पालन करना है। इन व्यवहारों में चार महत्वपूर्ण अनुशंसाएं सम्मिलित हैं,- सर्व प्रथम शिशु के जन्म के एक घंटे के अन्दर माँ के द्वारा स्तनपान कराना। यहां पर उल्लेखनीय है कि महिला बाल विकास एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों के चलते प्रदेश में संस्थागत प्रसव अब 87 प्रतिशत तक होने लगे हैं। किन्तु प्रथम एक घंटे में स्तनपान कराने वाली माताओं का प्रतिशत 34 है, अर्थात शीघ्र स्तनपान के जीवन रक्षक हस्तक्षेप को गंभीरता से कियान्वित करने की दिशा में सम्मिलित प्रयास जरूरी है। दूसरी अनुशंसा केवल 6 माह तक माँ का स्तनपान कराने की हैं और इस दिशा में भी जनजागरण की आवश्यकता है क्योंकि मध्यप्रदेश में मात्र 58 प्रतिशत बच्चों को केवल स्तनपान कराया जाता है। तीसरी अनुशंसा छ माह के बाद से स्तनपान के साथ-साथ ऊपरी आहार देने की है। इसे प्रचारित करने के उद्देश्य से हर आंगनबाडी केन्द्र पर मंगल दिवस के अंतर्गत अन्नप्राशन कराया जाता है। यह भी कुपोषण से निपटने की दिशा में वेहद प्रभावी हस्तक्षेप है, चौथी अनुशंसा दो वर्ष की आयु तक के बच्चे को ऊपरी आहार के साथ सतत् स्तनपान कराने की है। चाहे बच्चा बीमार हो. या माता बीमार हो दोनों ही स्थितियों में स्तनपान सर्वोत्तम आहार है। दुनिया भर में शिशु मृत्यु दर तथा शिशु रूग्णता दर को कम करने के लिए स्तनपान को सर्वाधिक प्रभावी हस्तक्षेप माना गया है। सतत् विकास लक्ष्य 2030 था वर्ल्ड हेल्थ एसेम्बली लक्ष्य 2025 में निर्धारित रतनपान के सूचकाकों के अनुसार म0प्र0 को निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचाने में वर्तमान स्तनपान की स्थिति में कम से कम 10 प्रतिशत (68.2) का इजाफा करना होगा।
    
वर्ष 2018 के विश्व स्तनपान सप्ताह का उद्देश्य कुपोषण के सभी प्रकारों का निवारण करना। आपातकाल, आपदाओं के समय भी लोगों के लिये खाद्य सुरक्षा सुविधा उपलब्ध कराना है। कुपोषण पर लक्षित प्रहार करते हुए गरीबी के कुपोषण को तोड़ना है। स्तन पान के महत्व को अधिक से अधिक प्रचारित प्रसारित करने की जरूरत है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और आशा कार्यकर्ताओं का दायित्व है, कि वे गांव-गांव, घर-घर महिलाओं, गर्भवती माताओं को स्तनपान के महत्व को समझाये। ताकि देश के भविष्य को रूग्णता और कुपोषण के कुचक्र में फसने से बचाया जा सके।