नई दिल्ली
राष्ट्रपति कोविंद ने सामाजिक कार्य के लिए श्रीमती तुलसी गौड़ा को पद्मश्री प्रदान किया। वह कर्नाटक की एक पर्यावरणविद् हैं, जिन्होंने 30,000 से अधिक पौधे लगाए हैं और पिछले छह दशकों से पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों में शामिल हैं।
भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमवार को साल 2020 के लिए 119 लोगों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया। जिसमें कर्नाटक के होनाली गांव के रहने वाली पर्यावरणविद तुलसी गौड़ा को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया है। वह अब तक पूरे 30 हजार से अधिक पौधे लगा चुकी हैं, और वह वन विभाग की नर्सरी की देखभाल भी करती हैं। उनके इसी सराहनीय काम और समाजसेवी भावना को देखते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस अवसर पर तुलसी गौड़ा को पद्मश्री पुरस्कार के लिए बधाई दी।
President Kovind presents Padma Shri to Smt Tulsi Gowda for Social Work. She is an environmentalist from Karnataka who has planted more than 30,000 saplings and has been involved in environmental conservation activities for the past six decades. pic.twitter.com/uWZWPld6MV
— President of India (@rashtrapatibhvn) November 8, 2021
इतना ही नहीं भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस पर एक ट्वीट भी किया गया। उनके ट्वीट में लिखा था कि राष्ट्रपति कोविंद ने सामाजिक कार्य के लिए श्रीमती तुलसी गौड़ा को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया है। वह कर्नाटक की एक पर्यावरणविद् हैं, जिन्होंने 30,000 से अधिक पौधे लगाए हैं और पिछले 6 दशकों से पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों में सम्मिलित हैं।
72 साल की उम्र में तुलसी गिनकर बता नहीं सकतीं कि उन्होंने ज़िंदगीभर कुल कितने पेड़ लगाए हैं। वे 40,000 का अंदाज़ा लगाती है, पर असली संख्या शायद एक लाख से भी ऊपर है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी जंगल संरक्षण को समर्पित कर दिया है और पेड़ों के बारे में उनके ज्ञान की सीमा नहीं है। तुलसी गौडा अपने क्षेत्र के हर जंगल को अपने हाथ की लकीरों से अच्छा पहचानती हैं, जिसकी वजह से ‘एन्साइक्लोपीडिया’ या विश्वकोश कहा जाता है।
तुलसी का जन्म कर्नाटक के हलक्की जनजाति के एक परिवार में हुआ था। बचपन में उनके पिता चल बसे थे और उन्होंने छोटी उम्र से मां और बहनों के साथ काम करना शुरू कर दिया था। इसकी वजह से वे कभी स्कूल नहीं जा पाईं और पढ़ना-लिखना नहीं सीख पाईं। 11 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई पर उनके पति भी ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहे। अपनी ज़िंदगी के दुख और अकेलेपन को दूर करने के लिए ही तुलसी ने पेड़-पौधों का ख्याल रखना शुरू किया। वनस्पति संरक्षण में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और वे राज्य के वनीकरण योजना में कार्यकर्ता के तौर पर शामिल हो गईं। साल 2006 में उन्हें वन विभाग में वृक्षारोपक की नौकरी मिली और चौदह साल के कार्यकाल के बाद वे आज सेवानिवृत्त हैं। इस दौरान उन्होंने अनगिनत पेड़ लगाए हैं और जैविक विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।















