भोपाल
प्रदेश में पिछले तीन साल में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या एक से बढ़कर अब तीन पर पहुंच गई है। नक्सलियों की गतिविधियों के लगातार बढ़ने के बाद भी पिछले चार साल से केंद्र सरकार वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) के तहत इन जिलों के विकास और सुरक्षा के लिए दिए जाने वाले बजट पर कटौती कर रहा है। हालात यह हो गई कि जहां प्रदेश को हर साल करोड़ों रुपए का फंड मिलता था, वहीं अब इन क्षेत्रों के विकास और सुरक्षा के लिए फंड लाखों रुपए तक
सिमट गया है।
देश के दस वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) प्रभावित प्रदेशों में से वर्ष 2018 और 2019 के वित्तीय वर्ष में सिक्युरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर (एसआरई ) स्कीम में सबसे कम फंड मध्य प्रदेश को दिया गया। वर्ष 2018-19 में एक करोड 94 लाख रुपए का फंड मिला, जबकि वर्ष 2019-20 में एक करोड 23 लाख रुपए का फंड इस स्कीम के तहत प्रदेश को मिला। यह राशि एलडब्ल्यूई में शामिल आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल, महाराष्टÑ, ओडिसा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से कम थी।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एसआईएस) के तहत वर्ष 2017-18 में मध्य प्रदेश को दो करोड़ 90 लाख रुपए केंद्र से मिले। जबकि वर्ष 2019-20 में यह राशि महत 71 लाख रुपए का सिमट गई।
वर्ष 2013 में प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिलों में सिर्फ बालाघाट ही बचा था। इसके बाद वर्ष 2019 में एलडब्ल्यूई जिलों की सूची में मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले को भी शामिल किया गया। यहां पर लगातार नक्सलवादी अपनी गतिविधियों को अंजाम देते रहे, इस दौरान नक्सलियों की पहुंच कान्हा नेशनल पार्क तक हो गई थी। अब एलडब्ल्यूई की सूची में डिंडौरी को भी शामिल कर लिया गया है।
इधर, गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा है कि शिवराज सिंह चौहान की सरकार कानून की सरकार है। समाज विरोधी या राष्टÑ विरोधी गतिविधियां प्रदेश में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इनसे निपटने के लिए जिस भी फोर्स की आवश्यकता होगी वह उपलब्ध कराई जाएगी।
सिक्युरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर (एसआरई) स्कीम में वर्ष 2017-18 में केंद्र सरकार ने प्रदेश को दो करोड़ 90 लाख रुपए की राशि दी थी। जबकि वर्ष 2020-21 में यह राशि लाखों में पहुंच गई। केंद्र से महत 83 लाख रुपए ही प्रदेश को इस स्कीम के तहत मिले।















