देश के बड़े हिस्सों में जाति-धर्म के आधार पर चुनावों का परिणाम

 

देश में पिछड़ी-दलित जातियों का बड़ा हिस्सा चुनावों परिणाम को प्रभावित करती है और उनके वोट फिलहाल किसकी झोली में जायेगा । इसलिए ऐसे समीकरणों के जरिए हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला करने की बात एक दिवास्वप्न ही दिखती है। लेकिन इन पार्टियों की मुश्किल यह है कि उन्होंने इसके अलावा किसी अनन्य मुद्दों पर नहीं सोचा।

यद्यपि चुनाव लोकतांत्रिक राजनीति में मुख्य संस्थाओं में से एक माने जाते हैं, उनका दुरुपयोग कोई असामान्य
बात नहीं। ये चुनाव सरकार की भिन्न-भिन्न प्रणालियों में भिन्न-भिन्न परिणाम सामने लाते हैं। सभी प्रकार
के नेतागण, शासन करने हेतु वैधता प्रदान करने में चुनावों की शक्ति और महत्त्व को मान्यता देते हैं। ग़ैर-लोकतांत्रिक तरीकों से देश को चलाने के इच्छुक नेतागण सत्ता में बने रहने के लिए चुनावों को एक हथियार के रूप प्रयोग करते हैं। ये नेतागण चुनावों में चालबाज़ी करने के लिए बड़े-बड़े प्रयास करते हैं।

यूपी का विधानसभा चुनाव इस बार तीन दशक पुरानी रणनीति पर लड़ा जा रहा है। 1993 में यूपी मंडल बनाम कमंडल की राजनीति की प्रयोगशाला बनी। करीब 29 साल बाद सपा एक बार फिर चुनाव को उसी फार्मूले की ओर से जाने में लगी है। गुरुवार को बीजेपी से इस्तीफा देकर आए दो मंत्रियों स्वामी प्रसाद मौर्य व धर्म सिंह सहित 8 विधायकों ने सपा की सदस्यता ली। इस दौरान स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने भाषण की पूरी टोन अगड़ा बनाम पिछड़ा के इर्द-गिर्द रखी। उन्होंने कहा कि सरकार बनाए दलित व पिछड़ा और मलाई खाए 5% अगड़ा, यह नहीं चलेगा। स्वामी ने सीएम योगी आदित्यनाथ पर हमला बोलते हुए कहा कि वह हिंदू हितैषी होने का दावा करते हैं तो क्या उनके हिंदू की परिभाषा में पिछड़ा व दलित नहीं आता ? सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी कह दिया कि यह लड़ाई 80 बनाम 20 की हो गई हे। उनका भी इशारा साफ तौर पर पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक बनाम अगड़ा की ओर ही था। अयोध्या में योगी के चुनाव लड़ने की चर्चा के बीच ध्रुवीकरण के खतरों को देखते हुए सपा की कोशिश है कि चुनाव को जातीय पिच पर लड़ा जाए। 1993 में मुलायम व कांशीराम ने मिलकर इसी नुस्खे से रामरथ पर सवार बीजेपी को सत्ता से रोका था। हालांकि, 2022 में स्थितियां भी अलग हैं और बीजेपी की सामाजिक भागीदारी की तस्वीर भी अलग। ऐसे में इस फार्मूले का चुनाव में नए सिरे से लिटमस टेस्ट होगा।

भारतीय जनता पार्टी चुनावों के समय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश करे, तो उसमें कोई हैरत की बात नहीं है। आखिर देश के एक बड़े इलाके में अब तक ये उसका रामबाण साबित होता रहा है। तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए जारी प्रचार अभियान के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इस चुनाव को 80 बनाम 20 फीसदी का मुकाबला बताना आश्चर्यजनक नहीं है। जाहिर है, उनका इशारा हिंदू और मुस्लिम आबादी के प्रतिशत की तरफ है।इससे यह संकेत मिलता है कि सपा अन्य मंडल वादी पार्टियों ने सामाजिक सोच के हालिया बदलाव से कुछ नहीं सीखा है।

वे अभी भी 1990 के दशक के दौर में जी रही हैं, जब मंडल वादी समीकरण कम से कम बिहार और उत्तर प्रदेश में भारी पड़ रहे थे। लेकिन उसके बाद अस्मिता की इस राजनीति को भाजपा ने हिंदुत्व की बड़ी अस्मिता की राजनीति से न सिर्फ भोथरा, बल्कि काफी हद तक निराधार भी कर दिया। आज पिछड़ी और दलित जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ है और उनके वोट फिलहाल उसकी झोली में हैं।

लेकिन इन पार्टियों की मुश्किल यह है कि उन्होंने इसके अलावा किसी नैरेटिव के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने अपनी कोई अलग आर्थिक नीति तय नहीं की। व्यापक संदर्भ में किसी वैकल्पिक राजनीति की कल्पना नहीं की। जबकि भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग की कारगर रणनीति अपना कर जातीय गोलबंदी के आधार पर बने उनके जनाधार को तोड़ दिया।  मंडल वादी राजनीति पर ये नियम इस सदी के आरंभ में लागू होने लगा था। यह भाजपा की रणनीति पर भी लागू होती है ।

राजनीति विभिन्न धर्मों के अंतर संबंधों की व्याख्या करती है और शक्तिशाली भूमिका भी निभाती है। जैसे की सरकार में मौजूद अधिकतर सांसद और कभी कभी तो प्रधानमंत्री तक बड़े नेता भी इस चीज को साबित कर चुके है और स्पष्ट रूप से दिखाई देते है