नई दिल्ली
1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच में भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई। मेजर ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा ‘गोल’ में इस हार का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘जब तक मैं जीवित रहूंगा। इस हार को कभी नहीं भूलूंगा।
इस हार ने हमें इतना हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं पाए।’ जर्मनी के खिलाफ फाइनल मैच 14 अगस्त 1936 को खेला जाना था, लेकिन उस दिन बहुत बारिश हुई। इसलिए मैच अगले दिन, यानी 15 अगस्त को खेला गया।
मैच से पहले मैनेजर पंकज गुप्ता ने अचानक ‘कांग्रेस पार्टी’ झंडा निकाला। उसे सभी खिलाड़ियों ने सैल्यूट किया। उस समय तक भारत का अपना कोई झंडा नहीं था। वह ब्रिटेन के अधीन था और ‘यूनियन जैक’ के तले ओलंपिक खेलों में हिस्सा ले रहा था। बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40 हजार लोग फाइनल देखने के लिए मौजूद थे। देखने वालों में बड़ौदा के महाराजा और भोपाल की बेगम के साथ-साथ जर्मन नेतृत्व के चोटी के लोग मौजूद थे।
हाफ टाइम तक भारत सिर्फ एक गोल से आगे था। इसके बाद ध्यानचंद ने अपने स्पाइक वाले जूते उतारे और नंगे पांव खेलने लगे। इसके बाद तो गोलों की झड़ी लग गई। 6 गोल खाने के बाद जर्मन रफ हॉकी खेलने लगे। उनके गोलकीपर की स्टिक ध्यानचंद के मुंह पर इतनी जोर से लगी कि उनका दांत टूट गया।
उपचार के बाद मैदान में वापस आने के बाद ध्यानचंद ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए, सिर्फ जर्मन खिलाड़ियों को यह दिखाया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है। भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया और उसमें तीन गोल ध्यानचंद ने किए थे।















