नई दिल्ली/दुशांबे
तालिबान शासन स्थापित होते ही भारत सरकार लगातार अफगानिस्तान में मौजूद भारतीयों को निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही है और ऐसे वक्त में भारत का वो सीक्रेट हवाई अड्डा भारतीयों के लिए वरदान की तरफ सामने आया है, जो सालों से मौजूद है, लेकिन वो इंडियन एयरफोर्स के लिए गुप्त ठिकाना है। विदेशी जमीन पर स्थापित भारत का ये सीक्रेट हवाई अड्डा आज सिर्फ भारतीयों के लिए ही नहीं, बल्कि कई दुसरे देशों के नागरिकों की भी जान बचा रहा है। कहां है भारत का यह सीक्रेट हवाई अड्डा और कैसे ये भारतीयों के लिए वरदान बन गया है, आईये जानते हैं। गिस्सार मिलिट्री एयरोड्रम काबुल एयरपोर्ट पर भारी भीड़ थी और इंडियन एयरफोर्स के सी-17 एयरक्राफ्ट को वहां लैंडिंग के लिए जगह नहीं मिल रही थी और कुछ देर तक जगह मिलने का इंतजार करने के बाद अचानक इंडियन एयरफोर्स का एयरक्राफ्ट सी-17 काबुल एयरपोर्ट से अपनी दिशा बदल लेता है और ताजिकिस्तान की तरफ रूख कर लेता है। इंडियन एयरफोर्स के विमान ने अपने सीक्रेट हवाई अड्डे की तरफ उड़ान भर दी थी, जो अब तक दुनिया की नजरों में नहीं आया था। इंडियन एयरफोर्स का सी-17 एयरक्राफ्ट गिस्सार मिलिट्री एयरोड्रम पर उतरता है, जो विदेश में स्थित भारत का इकलौता सैन्य बेस है।
भारत का इकलौता 'सीक्रेट' अड्डा गिस्सार मिलिट्री एयरोड्रम यानि जीएमए, विदेशी जमीन पर मौजूद भारत का पहला सैन्य अड्डा है और अफगानिस्तान की सीमा के बेहद पास मौजूद होने की वजह से भारत को काफी ज्यादा रणनीतिक बढ़त देता है। यहां से भारत काफी आसानी से अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मिलिट्री ऑपरेशन चला सकता है और इस वक्त जब भारतीयों को अफगानिस्तान से निकालने में परेशानी हो रही थी, भारत का ये सीक्रेड हवाई अड्डा किसी वरदान की तरफ सामने आया है। रक्षा सूत्रों के हवाले से प्रिंट ने लिखा है कि, जीएमए, जिसे अयनी एयरबेस के नाम से भी जाना जाता है। ये नाम अयनी गांव के नाम पर रखा गया है, जो ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे के ठीक पश्चिम में है। यह करीब 20 सालों से ताजिकिस्तान के साथ भारत द्वारा प्रशासित है।
भारत ने खर्च किए करोड़ों डॉलर द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2001-2002 में जब अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार थी, उस वक्त भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और भारतीय विदेश मंत्रालय ने देश से बाहर इस सैन्य बेस का प्रस्ताव रखा था और तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिंस ने इसका समर्थन किया था। भारतीय वायुसेना के तत्कालीन एयर कॉमडोर थे, नसीम अख्तर, जिन्हें इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी अटल बिहारी बाजपेयी ने दी थी। भारत सरकार ने इस काम के लिए बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन यानि बीआरओ की भी मदद ली थी। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने इस एयरपोर्ट का निर्माण और विस्तार किया। भारतीय टीम ने यहां हैंगर, ओवरहॉलिंग और रीफ्यूलिंग क्षमता विकसित किए और 2005 में एयरचीफ मार्शल धनोआ को इस बेस का फर्स्ट कमांडर नियुक्त किया गया था और नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पहली बार भारत के इस सीक्रेट एयरबेस पर फाइटर प्लेन्स की तैनाती की है।
अजित डोवाल का गहरा रिश्ता द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी जमीन पर स्थिति इस एयरबेस की स्थापना में भारत के वर्तमान नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोवाल और तत्कालीन एयरचीफ मार्शल बीएस धनोवा का काफी ज्यादा महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इससे पहले भारत का ये सीक्रेट एयरबेस बहुत हद तक गुप्त था और इसकी जानकारी कम ही लोगों को थी कि भारतीय फाइटर एयरक्राफ्ट भी यहां तैनात हैं, लेकिन अभी इस एयरबेस के बिना अफगनिस्तान से भारतीयों को निकालना संभव नहीं था। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय वायुसेना के सी-17 और C-130 J परिवहन विमानों ने ताजिकिस्तान एयरबेस का इस्तेमाल किया है। उदाहरण के लिए, एक सी-130 जे विमान ने काबुल से 87 भारतीयों को एयरलिफ्ट किया और ताजिकिस्तान में उतरा। निकाले गए लोगों को फिर वहां से एयर इंडिया की एक उड़ान द्वारा अयनी एयरबेस से भारत वापस लाया गया।
2002 में शुरू हुआ था जीएमए प्रोजेक्ट जीएमए यानि गिस्सार मिलिट्री एयरोड्रम और फरखोर एयरबेस को लेकर लोग अकसर कन्फ्यूज हो जाते हैं, जो दक्षिणी ताजिकिस्तान में स्थिति है, जो अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा के करीब है। और फरखोर वो शहर है, जहां भारत ने 1990 के दशक में अस्पताल सेवा चलाया था। फरखोर में स्थिति भारतीय अस्पताल के बारे में हम आपको एक हैरान करने वाली बात बताते हैं। तालिबान के खिलाफ अभी नॉर्दर्न एलायंस ने मोर्चा खोल रखा है, जिसा नेतृत्व अहमद शाह मसूद के बेटे कर रहे हैं। अहमद शाह मसूद वो शख्स हैं, जिन्होंने तालिबान को हमेशा से पंजशीर में शिकस्त दी है और उन्होंने तालिबान के खिलाफ पंजशीर को एक किला बनाकर रखा हुआ है। भारतीय अस्पताल में इलाज 2001 में अहमद शाह मसूद के ऊपर तालिबान ने आत्मघाती हमला किया था, जिसमें वो बुरी तरह से घायल हो गये थे और उस वक्त अहमद शाह मसूद को फरखोर में स्थिति भारतीय अस्पताल में ही इलाज किया गया था। हालांकि, उनकी स्थिति काफी ज्यादा गंभीर थी और कई दिनों तक इलाज चलने के बाद उनकी मौत हो गई थी। लिहाजा, पंजशीर में जो तालिबान विरोधी गुट है, उस गुट का भारत के साथ काफी गहरा रिश्ता है और उसमें एक नेता और हैं अमरूल्ला सालेह, जो कुछ दिन पहले तक अफगानिस्तान के उप-राष्ट्रपति थे और अभी अफगानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति…जो भारत के काफी करीबी और पाकिस्तान के कट्टर विरोधी हैं।















